लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां (इन्हन्पूषार्यम्णाम्) इन्नन्त, हन्नन्त, पूषन्शब्दान्त तथा अर्यमन्शब्दान्त (अङ्गानाम्) अङ्गो की (उपधाया ) उपधा के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ हो जाता है। पूर्वसूत्र के नियम से 'सुं' मे दीर्घ नही हो सकता था, अब इस से 'सुं' मे हो जाता है। शेष 'शि'- भिन्न सर्वनामस्थान मे पूर्वनियमानुसार निषेध ही रहेगा। 'वृत्रहन् + स्' यहा प्रकृतसूत्र से दीर्घ हो जाता है - वृत्रहान् + स् । अब हल्ङ्या- ब्भ्य० (१७६) से सकारलोप तथा न लोप ० (१८०) से नकार का लोप हो कर 'वृत्रहा' प्रयोग सिद्ध होता है। 'वृत्रहन् + औ' यहा प्राप्त उपधादीर्घ का इन्हन्पूषार्यम्णां शो (२८४) सूत्र से निषेध हो जाता है। अट्कुप्वाङ्० (१३८) से णत्व भी नही हो सकता क्योकि समान- पद नही है। अत णत्व करने के लिये अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है- [लघु०] विधि-सूत्रम् - (२८६) एकाजुत्तरपदे णः ।८।४।१२॥ एकाजुत्तरपदं यस्य तस्मिन्समासे पूर्वपदस्थान्निमित्तात्परस्य प्राति- पदिकान्तनुम्विभक्तिस्थस्य नस्य ण स्यात् । वृत्रहणौ ॥ अर्थः-एक अच् वाला उत्तरपद है जिस के, ऐसे समास मे पूर्वपद मे ठहरे निमित्त (ऋ, र् ष्) से परे प्रातिपदिकान्त, नुंम् तथा विभक्ति मे स्थित नकार को णकार आदेश हो जाता है। व्याख्या - एकाजुत्तरपदे ।७।१। पूर्वपदाभ्याम् ।५।२। (पूर्वपदारसञ्ज्ञायामगः मे) । रषाभ्याम् ।५।२। नः ।६।१। ण. ।१।१। (रषाभ्यां नो णः समानपदे से)। प्राति- पदिकान्तनुम्विभक्तिषु ।७।३। (प्रातिपदिकान्त० से)। समास - एकोऽच् यस्मिन् तद् एकाच्, बहुव्रीहिसमास । एकाच् उत्तरपदं यस्य स एकाजुत्तरपद. (समास), तस्मिन् = एकाजुत्तरपदे, बहुव्रीहिसमास । पूर्व पदं ययोस्तो पूर्वपदो (रषौ), ताभ्याम् = पूर्वपदाभ्याम् (रषाभ्याम्), बहुव्रीहिसमासः । प्रातिपदिकस्य अन्त = प्रातिपदिकान्त, षष्ठीतत्पुरुष । प्रातिपदिकान्तश्च नुम् च विभक्तिश्च = प्रातिपदिकान्तनुम्विभक्तय, तासु = प्रातिपदिकान्तनुम्विभक्तिषु, इतरेतरद्वन्द्व । अर्थ - (एकाजुत्तरपदे) जिस समास में उत्तरपद एक अच् वाला हो उस समास मे (पूर्वपदाभ्याम्) पूर्वपद वाले (रषा- भ्याम्) रेफ षकार से परे (प्रातिकान्तनुम्विभक्तिपु) प्रातिपदिक के अन्त मे, नुंम् मे, तथा विभक्ति मे स्थित (न.) नकार के स्थान पर (ण) णकार आदेश हो जाता है। 'वृत्रहन् + औ' यहा उपपदसमास मे 'वृत्र' यह पूर्वपद तथा 'हन्' यह उत्तरपद है। उत्तरपद 'हन्' एक अच् वाला है। पूर्वपद मे तकारोत्तर रेफ भी विद्यमान है अत उस से परे प्रातिपदिक के अन्त मे स्थित नकार को णकार हो कर 'वृत्रहणौ' प्रयोग सिद्ध होता है। इसी प्रकार आगे सर्वनामस्थानों मे - 'वृत्रहण, वृत्रहणम्, वृत्रहणौ' रूप बनते हैं। 'वृत्रहन् + अस्' (शस्) यहा एकाजुत्तरपदे णः (८४ १२) के असिद्ध होने से अल्लोपोऽन. (६४ १३४) द्वारा अन् के अकार का लोप हो जाता है। 'वृत्रहन् + अस्' इस अवस्था में अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होना है-