लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 400, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३८५ १७. सुशर्मन् (प्राचीनकाल का एक राजा, अच्छी तरह सुखी) । १८. शतधन्वन् (प्राचीनकाल का एक राजा)। १६. पाप्मन् (पाप)। २०. अध्वन् (मार्ग)-इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं। वृत्रं हतवान् इति वृत्रहा । वृत्रकर्मोपपदाद् हन हिंसागत्योः (अदा० प०) इति धातोर् ब्रह्मभ्रूणवृत्रेषु क्विप् (३.२.८७) इति भूते कर्तरि क्विप् । वृत्र को मारने के कारण इन्द्र का नाम 'वृत्रहन्' है । वृत्रहन् + स् (सुं) । यहां सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) द्वारा नान्त की उपधा को दीर्घ प्राप्त होता है। इस पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है- [लघु०] नियम-सूत्रम्-(२८४) इन्हन्पूषार्यम्णां शौ ।६।४।१२॥ एषां शावेवोपधाया दीर्घा नान्यत्र । इति निषेधे प्राप्ते- अर्थः-इन्नन्त, हन्शब्दान्त, पूषन्शब्दान्त तथा अर्यमन्शब्दान्त अङ्गों की उपधा को शि परे होने पर ही दीर्घ हो अन्यत्र न हो। इस से निषेध प्राप्त होने पर (अग्रिम- सूत्र प्रवृत्त होता है।) व्याख्या-इन्हन्पूषार्यम्णाम् ।६।३। अङ्गानाम् ।६।३। (अङ्गस्य का वचन- विपरिणाम हो जाता है)। शौ ।७।१। उपधायाः ।६।१। (नोपधायाः से)। दीर्घः ।१।१। (ढूलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से) । 'अङ्गानाम्' का विशेषण होने से 'इन्हन्पूषार्यम्णाम्' से तदन्तविधि हो जाती है। अर्थः- (इन्हन्पूषार्यम्णाम्) इन्नन्त, हन्नन्त, पूषन्दशब्दान्त तथा अर्यमन्दशब्दान्त (अङ्गानाम्) अङ्गों की (उपधायाः) उपधा के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ हो जाता है (शौ) शि परे होने पर। नपुंसकलिङ्ग में 'शि' की शि सर्वनामस्थानम् (२३८) सूत्र-द्वारा सर्वनाम- स्थानसञ्ज्ञा होती है, अतः उस के परे होने पर सूत्र में गिनाये सब शब्दों की उपधा को सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) से ही दीर्घ हो सकता है। पुनः इस सूत्र द्वारा दीर्घविधान सिद्धे सत्यारम्भो नियमार्थः के अनुसार नियमार्थ है। अर्थात्-इन की उपधा को यदि दीर्घ हो तो 'शि' परे होने पर ही हो, अन्यत्र न हो-यह नियम फलित होता है। 'वृत्रहन् + स्' यहां हन्शब्दान्त से परे 'सुं' वर्तमान है 'शि' नहीं, अतः प्रकृत- नियम से यहां दीर्घ प्राप्त नहीं हो सकता। इस पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है- [लघु०] विधि-सूत्रम्-(२८५) सौ च ।६।४।१३॥ इन्नादीनामुपधाया दीर्घोऽसम्बुद्धौ सौ (परे) । वृत्रहा । हे वृत्रहन् ! ॥ अर्थः- इन्नन्त आदि अङ्गों की उपधा को दीर्घ हो, सम्बुद्धि-भिन्न सुं परे हो तो। व्याख्या-इन्हन्पूषार्यम्णाम् ।६।३। (इन्हन्पूषार्यम्णां शौ से)। अङ्गानाम् ।६।३। (अङ्गस्य यह अधिकृत है) । उपधायाः ।६।१। (नोपधायाः से) । दीर्घः ।१।१। (ढूलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से)। असम्बुद्धौ ।७।१। (सर्वनामस्थाने चाऽसम्बुद्धौ से)। सौ ।७।१। च इत्यव्ययपदम् । अर्थः-(असम्बुद्धौ) सम्बुद्धिभिन्न (सौ) सुं परे होने पर ल० प्र० (२५)