लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां द्वारा भूतकालिक 'क्वनिँप्' प्रत्यय हो कर 'यज्वन्' शब्द सिद्ध होता है। इष्टवान् इति यज्वा, जो यज्ञ कर चुका है वह 'यज्वन्' कहाता है। 'यज्वन्' शब्द की सम्पूर्ण प्रक्रिया 'राजन्' शब्दवत् होती है, केवल भसञ्ज्ञकों में अल्लोपोऽनः (२४७) द्वारा प्राप्त अत् के लोप का निषेध हो जाता है— [लघु०] निषेध-सूत्रम् (२८३) न संयोगाद्वमन्तात् ।६।४।१३७॥ वमन्तसंयोगादनोऽकारस्य लोपो न। यज्वनः। यज्वना। यज्वभ्याम्। ब्रह्मन् । ब्रह्मणा ॥ अर्थ—वकारान्त वा मकारान्त संयोग से परे अन् के अकार का लोप न हो। व्याख्या—वमन्तात् ।५।१। संयोगात् ।५।१। अनः ।६।१। अल्लोपः ।१।१। (अल्लोपोऽनः से)। न इत्यव्ययपदम्। समास—वश्च म् च=वमौ, इतरेतरद्वन्द्वः । वकारादकार उच्चारणार्थः। वमौ अन्तो यस्य स वमन्, तस्मात् =वमन्तात्, बहुव्रीहि- समासः। अर्थ—(वमन्तात्) वकारान्त और मकारान्त (संयोगात्) संयोग से परे (अनः) अन् के (अल्लोपः) अकार का लोप (न) नहीं होता। 'यज्वन् + टा (शस्)' यहां 'यज्व्-अन्' शब्द में 'ज्व्' यह वकारान्त संयोग है अतः इस से परे अन् के अकार का लोप न हुआ—'यज्वनः' सिद्ध हुआ। एवम् आगे भी भसञ्ज्ञाओं में समझ लेना चाहिये। रूपमाला यथा— प्र० यज्वा यज्वानौ यज्वानः | प० यज्वनः यज्वभ्याम् यज्वभ्यः द्वि० यज्वानम् ,, यज्वनः | ष० ,, यज्वनोः यज्वनाम् तृ० यज्वना यज्वभ्याम् यज्वभिः | स० यज्वनि ,, यज्वसु च० यज्वने ,, यज्वभ्यः | सं० हे यज्वन् ! हे यज्वानौ ! हे यज्वानः ! मकारान्त संयोग का उदाहरण 'ब्रह्मन्' (ब्रह्मा अथवा ब्राह्मण) है। 'ब्रह्मन्
- टा (शस्)' यहां 'ब्रह्म-अन्' शब्द में 'ह्म' यह मकारान्त संयोग है अतः इस से परे भसञ्ज्ञा अन् के अकार का लोप न हुआ—'ब्रह्मणा'। रूपमाला यथा— प्र० ब्रह्मा ब्रह्माणौ ब्रह्माणः | प० ब्रह्मणः ब्रह्मभ्याम् ब्रह्मभ्यः द्वि० ब्रह्माणम् ,, ब्रह्मणः | ष० ,, ब्रह्मणोः ब्रह्मणाम् तृ० ब्रह्मणा ब्रह्मभ्याम् ब्रह्मभिः | स० ब्रह्मणि ,, ब्रह्मसु च० ब्रह्मणे ,, ब्रह्मभ्यः | सं० हे ब्रह्मन् ! हे ब्रह्माणौ ! हे ब्रह्माणः ! इसी प्रकार—१ आत्मन् (आत्मा)। २ अश्मन् (पत्थर)। ३ पुण्ड्रधन्वन् (कामदेव)। ४ शार्ङ्गधन्वन् (विष्णु)। ५ सुपर्वन् (बाण, देवता)। ६ अनर्वन् (शत्रु- रहित)। ७ पृषत्त्वन्मन् (अग्नि)। ८ मातरिश्वन् (वायु)। ९ सुधमँन् (देवसभा)। १० प्रकृष्टवर्मन् (शुभ वर्मों वाला)। ११ अग्रजन्मन् (बड़ा भाई, ब्राह्मण)। १२. अन्तरामन् (परमात्मा)। १३ अभ्रिधन्वन् (मित्र)। १४ अनुजन्मन् (छोटा भाई)। १५ अध्वन्मन् (अनभ्यासी)। १६ अनात्मन् (जो पदार्थ आत्मा नहीं—शरीर आदि)।