भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 398

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३८३ इसी प्रकार निम्नस्थ शब्दों के रूप होते हैं। [ * यह चिह्न णत्वबोधक है ] शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ (१) अकिञ्चनिमनू = निर्धनता | (२४) प्रेमन्* = प्रियत्व, प्रेम, स्नेह (२) अणिमन् = अणुत्व, अणुपना | (२५) बधिरिमन्* = बहरापन (३) अम्लिमन् = अम्लत्व, खट्टापन | (२६) बंहिमन् = बाहुल्य, आधिक्य (४) आशिमन् = आशुता, शीघ्रता | (२७) बालिमन् = बालपन, लड़कपन (५) उष्णिमन् = उष्णता, गरमी | (२८) भूमन् = बहुत्व, आधिक्य (६) ऋजिमन् = ऋजुता, सरलता | (२९) भृशिमन् = भृशता, बहुतायत (७) कालिमन् = कालापन, कृष्णता | (३०) मधुरिमन्* = माधुर्य, मिठास (८) कृष्णिमन् = कृष्णता, कालापन | (३१) मन्दिमन् = मन्दत्व, मन्दपना (९) कृशिमन् = कृशत्व, दुबलापन | (३२) महिमन् = महत्त्व, गौरव (१०) क्षेपिमन्* = क्षिप्रता, शीघ्रता | (३३) मूकिमन् = मूकता, गूंगापन (११) क्षोदिमन् = क्षुद्रता, छुटप्पन | (३४) म्रदिमन् = मृदुता, कोमलता (१२) गरिमन्* = गुरुत्व, गौरव | (३५) रक्तिमन् = रक्तता, लाली (१३) चण्डिमन् = चण्डता, तीव्रता | (३६) लघिमन् = लघुता, हल्कापन (१४) जटिमन् = जड़त्व, मूर्खता | (३७) लवणमन् = लवणता, नमकीनपन (१५) तनिमन् = तनुत्व, पतलापन | (३८) लोहितिमन् = लोहितत्व, लाली (१६) द्रढिमन् = दृढ़ता, कठोरता | (३९) वरिमन्* = उरुत्व, विशालता (१७) द्राघिमन्* = दीर्घता, लम्बाई | (४०) शीतिमन् = शीतत्व, ठण्डक (१८) पटिमन् = पटुता, चतुराई | (४१) शुक्लिमन् = शुक्लत्व, सुफेदी (१९) पण्डितिमन् = पाण्डित्य, विद्वत्ता | (४२) श्वेतिमन् = श्वेतता, सुफेदी (२०) परिवृढिमन् = स्वामित्व | (४३) साधिमन् = साधुत्व, सज्जनता (२१) पाण्डिमन् = पाण्डुता, पीलापन | (४४) स्थेमन् = स्थिरता, दृढ़ता (२२) पाण्डुरिमन्* = पीलापन, सुफेदी | (४५) स्वादिमन् = स्वादुपना (२३) प्रथिमान् = पृथुता, विस्तार | (४६) ह्रसिमन् = ह्रस्वत्व, छुटप्पन इसी प्रकार—अश्वत्थामन्, उक्षन्, तक्षन्, वृषन्, मूर्धन् प्रभृति शब्दों के रूप होते हैं। [लघु०] यज्वा । यज्वानौ । यज्वानः ॥ व्याख्या—यजें (भ्वा० उभ०) धातु से सुयजोर्ङ्वनिँप् (३.२.१०३) सूत्र १. ये सब शब्द पृथादिभ्यः इमनिँचू (११५२) सूत्र द्वारा भाव में इमनिँच् प्रत्यय करने से निष्पन्न होते हैं। इमनिँचूप्रत्ययान्त शब्द पुंल्लिङ्ग हुआ करते हैं। केवल 'प्रेमन्' शब्द कहीं २ नपुंसक में प्रयुक्त होता है।