भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 397

३८२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां पर, यथा—राजभ्याम्, राजभ्यः। यहां सुँप् परे होने पर आत्त्व तथा एत्त्व प्राप्त होता है। स्वरविधि = स्वरस्य विधिः। यहां स्वर कर्म में शेषत्व की विवक्षा में षष्ठी विभक्ति हुई है। 'स्वर को विधान करना' यह अर्थ यहां अभिप्रेत है। सञ्ज्ञाविधि = सञ्ज्ञायाः विधिः। यहां भी कर्म में शेषत्व की विवक्षा में षष्ठी विभक्ति हुई है। 'सञ्ज्ञा को विधान करना' यह अर्थ यहां अभिप्रेत है। तुग्विधि = तुको विधिः। यहां भी तुँक् कर्म में शेषत्व की विवक्षा से षष्ठी विभक्ति जाननी चाहिये। 'कृति' यह 'तुग्विधि' के साथ ही सम्बन्ध रखता है, असम्भव होने से अन्यों के साथ नहीं। अतः 'कृत् परे होने पर तुँक् को विधान करना' यह अर्थ निष्पन्न होता है। अर्थ —(सुँप्स्वरसञ्ज्ञातुग्वि- धिषु) सुँप्सम्बन्धी विधान, स्वरविधान, सञ्ज्ञाविधान तथा कृत् प्रत्यय परे होने पर तुग्विधान करने में (नलोपः) नकार का लोप (असिद्धः) असिद्ध होता है। ये जितनी विधियां गिनाई गई हैं, सब अष्टाध्यायी के सवा सात अध्यायों में स्थित हैं। अतः इन विधियों के प्रति नकार का लोप त्रिपादीस्थ होने से ही पूर्वत्रा- सिद्धम् (३१) द्वारा असिद्ध है, पुनः यहां इन विधियों में नकारलोप को असिद्ध कहना नियमार्थ है—सिद्धे सत्यारम्भो नियमार्थः। अर्थात् इन विधियों में ही नकार का लोप असिद्ध हो अन्य विधियां में न हो। यथा—राज्ञोऽश्वः = राजाश्वः। 'राजन्‌ङस् अश्वसुँ' यहां षष्ठीतत्पुरुषसमास में सुँपो धातुप्रातिपदिकयोः (७२१) सूत्र से ङस् और सुँ का लुक् हो—राजन् अश्व। न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) सूत्र से नकार का लोप हो—राज अश्व। अब यहां नलोप के असिद्ध होने से अकः सवर्णे दीर्घः (४२) द्वारा सवर्णदीर्घ नहीं हो सकता। पुनः इस उपर्युक्त नियम से नकारलोप के सिद्ध हो जाने से वह हो जाता है। तो इस प्रकार—'राजाश्वः' रूप निष्पन्न होता है। इसी प्रकार —दण्ड्यश्वः, योग्यात्मा, मन्त्राज्ञा आदि प्रयोगों में नकारलोप के सिद्ध होने से यण्, 'राजेन्द्रः' आदि प्रयोगों में गुण तथा 'राजीयति, राजायते' में क्रमशः क्यचि च (७२२) में ईत्व और अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः (४८३) से दीर्घ हो जाता है। इस सूत्र का यही प्रयोजन है। 'राज् + भ्याम्' यहां सुँपि च (१४१) से आत्त्व, 'राज् + भिस्' यहां अतो भिस ऐस् (१४२) से भिस् का ऐस्, 'राज् + भ्यस्' यहां बहुवचने झल्येत् (१४५) में एत्त्व ये सुँब्विधियां प्राप्त होती हैं। इन के प्रति नकारलोप असिद्ध ही है अतः इन में से कोई भी कार्य न होगा। राजभ्याम्, राजभिः, राजभ्यः। राजन् + ङि(डि)। यहां विभाषा ङिश्योः (२४८) सूत्र से भसञ्ज्ञक अन् के अकार का वैकल्पिक लोप हो जाना है। लोपपक्ष में श्चुत्व हो कर—'राज्ञि'। लोपा- भाव में—'राजनि'। 'राजन्' शब्द की सम्पूर्ण रूपमाला यथा— प्र० राजा राजानौ राजानः । प० राज्ञः राजभ्याम् राजभ्यः द्वि० राजानम् " राज्ञः । ष० " राज्ञोः राज्ञाम् तृ० राज्ञा राजभ्याम् राजभिः । स० राज्ञि, राजनि " राजसु च० राज्ञे " राजभ्यः । सं० हे राजन्! हे राजानौ! हे राजानः!