भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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हलन्त-पुल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३८१ इस के उच्चारण का भी कहीं निर्देश करते; परन्तु उन्होंने ऐसा कहीं नहीं किया । इस को अपूर्व वर्ण मानने से स्तोः श्चुना श्चुः (६२) द्वारा श्चुत्व भी न हो सकेगा । यथा — तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्, एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तम्, यज्ज्ञात्वा मुच्यतेऽशुभात् इत्यादि । सिद्धान्तकौमुदी के जञोर्ज्ञः पर शेखरकार का वक्तव्य भी यहां द्रष्टव्य है—जञयोगे लोक- वेदसिद्धतादृशध्वनेर्लिपिविशेषस्य चानुवादकमभियुक्तवचनं न त्विदं वर्णान्तरम्, शिक्षा- दावपरिगणितत्वेन सत्सत्त्वे मानाभावात् । अत एव 'तज्ज्ञानम्' इत्यादौ श्चुत्वसिद्धिः । किञ्च यदि इस का उच्चारण 'ग्य' आदि होता तो प्राकृत में—मणोज्ज (मनोज्ञ), जण्ण (यज्ञ), अहिज्जो (अभिज्ञ), सव्वज्जो (सर्वज्ञ) इत्यादियों में इस प्रकार आदि में जकार वा णकार न होता । अतः 'ज्ञ' कोई स्वतन्त्र वर्ण नहीं यह सिद्ध होता है । इसी प्रकार 'क्ष्' के विषय में भी समझना चाहिये । यह भी 'क् + ष्' के योग से उत्पन्न होता है । राजन् + आ (टा)। भसञ्ज्ञक अन् के अकार का लोप हो कर श्चुत्व करने से— राज्ज् + आ = 'राज्ञा' प्रयोग सिद्ध होता है । 'राजन् + भ्याम्' इस स्थिति में न लोपः० (१८०) से पदान्त नकार का लोप हो जाता है । तब 'राज + भ्याम्' इस अवस्था में सुपि च (१४१) से दीर्घ प्राप्त होता है । उस पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] नियम-सूत्रम्— (२८२) नलोपः सुप्स्वरसञ्ज्ञातुग्विधिषु कृति । ८।२।२॥ सुब्विधौ स्वरविधौ सञ्ज्ञाविधौ कृति तुग्विधौ च नलोपोऽसिद्धो नान्यत्र 'राजाश्व' इत्यादौ । इत्यसिद्धत्वाद् आत्वमेत्वमैस्त्वं च न । राजभ्याम् । राजभिः । राजभ्यः २ । राज्ञि, राजनि । राजसु ॥ अर्थः—सुब्विधि, स्वरविधि, सञ्ज्ञाविधि तथा कृत्प्रत्ययपरक तुग्विधि करने में ही नकार का लोप असिद्ध होता है अन्यत्र नहीं । यथा—'राजाश्वः' इत्यादियों में असिद्ध नहीं होता । इत्यसिद्धत्वाद् इति — इस सूत्र से यहां नकारलोप के असिद्ध होने से आ-भाव, ए-भाव, ऐस्-भाव नहीं होता । व्याख्या — नलोपः ।१।१। सुप्स्वरसञ्ज्ञातुग्विधिषु ।७।३। कृति ।७।१। असिद्धः ।१।१। (पूर्वत्रासिद्धम् से लिङ्गविपरिणाम कर के) । समासः—नस्य लोपः=नलोपः, षष्ठीतत्पुरुषः । सुँप् च स्वरश्च सञ्ज्ञा च तुक् च = सुँप्स्वरसञ्ज्ञातुकः, इतरेतरद्वन्द्वः । तेषां विधयः = सुँप्स्वरसञ्ज्ञातुग्विधयः, तेषु = सुँप्स्वरसञ्ज्ञातुग्विधिषु, षष्ठीतत्पुरुषः । विधिशब्दोऽत्र भावसाधनः । विधानं विधिः । यहां सुँवादिगत शेषषष्ठी के साथ विधि- शब्द का समास हुआ जानना चाहिये । सुब्विधिः—सुँपो विधिः । यहां शेष में षष्ठी होने के कारण 'सुँप्सम्बन्धी विधि' ऐसा अर्थ हो जाता है । सुँप्सम्बन्धी विधि दो प्रकार की हो सकती है; एक तो सुँप् के स्थान पर, यथा—राजभिः । यहां अतो भिस ऐस् (१४२) सूत्र से भिस्=सुँप् के स्थान पर ऐस् प्राप्त होता है । दूसरी सुँप् परे होने