लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 395, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ें३८० | भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां 'हे राजन्' यहां सम्बुद्धि का लोप होने पर भी प्रत्ययलक्षण परिभाषा द्वारा सम्बुद्धि को मान कर नकारलोप का निषेध हो जाता है—हे राजन्' । [लघु०] वा०— (२५) ङावुत्तरपदे प्रतिषेधो वक्तव्यः ॥ ब्रह्मनिष्ठ । राजानौ । राजान । राज्ञ ॥ अर्थ—उत्तरपदपरक 'ङि' के परे होने पर न ङिसम्बुद्धयोः (२८१) सूत्र का निषेध कहना चाहिये । व्याख्या—ङौ ।७।१। उत्तरपदे ।७।१। प्रतिषेध ।१।१। वक्तव्य ।१।१। अर्थ— (उत्तरपद) उत्तरपद परे होने पर (ङौ) जो ङि, उस के परे होने पर (प्रतिषेध ) निषेध (वक्तव्य ) कहना चाहिये । किस का निषेध कहना चाहिये ? इस का उत्तर यह है कि जिस सूत्र पर जो वार्त्तिक पढ़ा जाता है वह तत्सूत्रविषयक ही समझा जाना है। यहां यह वार्त्तिक न ङिसम्बुद्धयोः (२८१) सूत्र पर पढ़ा गया है अतः यह न ङिसम्बुद्धयो द्वारा प्राप्त नकार-लोप के निषेध का ही निषेध करेगा।¹ यहां यह ध्यान में रखना चाहिये कि व्याकरण में समास के अन्तिम पद को उत्तरपद तथा आदिम पद को पूर्वपद कहते हैं। यथा—राज्ञ पुरुष = राजपुरुष । यहां 'राज्ञ' यह षष्ठ्यन्त पूर्वपद तथा 'पुरुष' यह प्रथमान्त उत्तरपद है। ब्रह्मनिष्ठ । ब्रह्मणि निष्ठा यस्य स ब्रह्मनिष्ठ । ब्रह्म में स्थिति या विश्वास रखने वाला पुरुष 'ब्रह्मनिष्ठ' कहाता है । 'ब्रह्मन्+ङि निष्ठा+सुं' यहां बहुव्रीहिसमास में सुपो धातु० (७२१) सूत्र से ङि और सुं का लुक् हो कर न लोप प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) सूत्र से नकार का लोप प्राप्त होता है, परन्तु न ङिसम्बुद्धयोः (२८१) सूत्र उस लोप का निषेध कर देता है क्योंकि प्रत्ययलक्षणपरिभाषा से 'ङि' परे स्थित है। अब ङावुत्तरपदे० इस प्रकृत वार्त्तिक से उस निषेध का भी निषेध हो कर पुनः न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) से नकारलोप हो जाता है। यहां 'ङि' से परे 'निष्ठा' यह उत्तरपद विद्यमान है। 'ब्रह्मनिष्ठा' ऐसा होने पर गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य (६५२) सूत्र द्वारा ह्रस्व हो कर विभक्ति लाने से ब्रह्मनिष्ठ' प्रयोग सिद्ध होता है। इसी प्रकार— 'आत्मविश्वास, चर्मतिल' आदि प्रयोग जानने चाहियें। 'राजन्+शस्' (शस्) यहां अल्लोपोऽन (२४७) सूत्र से भसञ्ज्ञक अन् के अकार का लोप हो कर—'राजन्+अस्' हुआ। अब स्तोः श्चुना श्चुः (६२) सूत्र से नकार को ञकार करने पर—राज्ञ्+अस्='राज्ञ' प्रयोग सिद्ध होता है। नोट—'ज्ञ्' यह संयुक्त व्यञ्जन है। ज् और ञ् के योग से इस की निष्पत्ति होती है। लिखने की सुविधा के लिये इस का ऐसा स्वरूप माना गया प्रतीत होता है। 'ज्ञ' को पृथक् वर्ण मान कर इस का 'ग्य' वा 'ज्य, ग्न, जन' आदि उच्चारण करना नितान्त अशुद्ध और शास्त्रविरुद्ध है। यदि यह अपूर्व वर्ण बन जाता तो शिक्षाकार १ यदि ङावुत्तरपदेऽप्रतिषेधो वक्तव्यः कही पाठ मिले तो उस का भाव यह होगा कि न ङिसम्बुद्धयो वाले निषेध को मत करो अर्थात् वहां पर 'न्' का लोप कर दो।