भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३७६ (ख) 'चतुर्षु' में रेफ को विसर्गादेश क्यों नहीं होता ? (ग) 'अग्निर्नयति' में णत्व क्यों नहीं होता ? (६) चत्वारः, केषाम्, प्रशान्तसु, चतुर्णाम्, अयम्, अनयोः, अस्मै, एनयोः, एभिः, एषु—इन रूपों की सूत्रनिर्देशपूर्वक सिद्धि करें। (१०) अनाप्यकः, दश्च, शरोऽचि, रषाभ्यां नो णः०, आद्यन्तवदेकस्मिन्, अतो गुणे—इन की व्याख्या करते हुए प्रत्येक को उदाहरणों में घटाएं। —:०:— अब नकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन प्रारम्भ करते हैं— [लघु०] राजा ।। व्याख्या—'राजृँ दीप्तौ (भ्वा० उभ०) धातु से कनिन् यु-वृषि-तक्षि-राजि- धन्वि-द्यु-प्रतिदिवः (उणा० १५४) सूत्रद्वारा कनिँन् प्रत्यय करने से राजन् (राजा) शब्द निष्पन्न होता है। राजते=शोभत इति राजा। 'राजन्+स्' (सुँ) यहां हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) सूत्र से सुंलोप तथा सर्वनाम- स्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) से उपधादीर्घ युगपत् प्राप्त होते हैं। परन्तु परत्व के कारण प्रथम उपधादीर्घ हो कर पश्चात् सुंलोप हो जाता है— राजान्+स् = राजान्। अब न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) सूत्र से नकार का लोप हो कर 'राजा' रूप सिद्ध होता है। 'राजन् + औ' यहां सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) मे उपधादीर्घ हो कर 'राजानौ' बनता है। इसी प्रकार आगे भी सर्वनामस्थानों में उपधादीर्घ हो जाता है— राजानः, राजानम्, राजानौ। हे राजन्+स्। यहां एकवचनं सम्बुद्धिः (१३२) से 'सुँ' की सम्बुद्धि सञ्ज्ञा है, अतः सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) से उपधादीर्घ नही होता। हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सुंलोप हो कर 'हे राजन् !' हुआ। अब यहां न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) सूत्र से नकार का लोप प्राप्त होता है, परन्तु यह अनिष्ट है। अतः इस का अग्रिमसूत्र से निषेध करते हैं— [लघु०] निषेध-सूत्रम्—(२८१) न ङिसम्बुद्ध्योः ।८।२।८। नस्य लोपो न, ङौ सम्बुद्धौ च। हे राजन् !॥ अर्थः—ङि अथवा सम्बुद्धि परे होने पर नकार का लोप नहीं होता। व्याख्या—न ।६।१। (लुप्तषष्ठीकं पदम्)। लोपः ।१।१। (न लोपः० से)। न इत्यव्ययपदम्। ङिसम्बुद्ध्योः ।७।२। समासः—ङिश्च सम्बुद्धिश्च = ङिसम्बुद्धी, तयोः = ङिसम्बुद्ध्योः, इतरेतरद्वन्द्वः। अर्थः—(ङिसम्बुद्ध्योः) ङि अथवा सम्बुद्धि परे हो तो (न=नस्य) नकार का (लोपः) लोप (न) नहीं होता¹। १. ङि का उदाहरण वेद में आता है—परमे व्योमन् (ऋ० १.१६४.३६)।