भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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३७८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

अनेन पूजितः कृष्णोऽथैनेन गिरिशोऽर्चितः । अनयोः केशवः स्वामी, शिवः स्वामी ह्यथैनयोः ॥ २ ॥ विशेष—किञ्चित्कार्यं विधातुम्० यहां 'विधातुम्' से केवल विधान का अभि- प्राय नहीं है । किसी अज्ञात बात को बतलाना या जनाना ही यहां अभिप्रेत है । अत एव —अप्येतमद्रेस्तनया शुशोच (रघु० २/३७) यहां विधानाभाव में भी अन्वादेश के स्वीकृत होने से 'एन' आदेश सिद्ध हो जाता है । ईषदर्थे क्रियायोगे मर्यादाऽभिविधौ च यः । एतम् आतं ङितं विद्याद् वाक्यस्मरणयोरङित् (देखें पृष्ठ ६०) इस पद्य के पूर्वार्ध में ईषद आदि लोकप्रसिद्ध अर्थों का अनुवाद ही प्रस्तुत किया गया है अत अज्ञातज्ञापन न होने से अन्वादेश के अभाव के कारण 'एन' आदेश नहीं हुआ । इसी प्रकार 'गीतगोविन्द' के — नक्तं भीरुरयं त्वमेव तदिमं राधे ! गृहं प्रापय (यह कृष्ण रात्रि में भीरु है अत तू=राधा ही इसे घर पहुंचा दे)—इस आद्य पद्य में ज्ञात- भीरुता का अनुवादमात्र प्रस्तुत होने से अन्वादेश न होने के कारण 'इमम्' का 'एनम्' नहीं हुआ । यहां यह जरूरी नहीं कि इदम् शब्द के द्वारा गृहीत का ही जब उसी इदम् शब्द के द्वारा दोबारा ग्रहण हो तभी अन्वादेश मान कर एन आदेश किया जाये, किन्तु प्रथम ग्रहण में चाहे यद्, तद् आदि किसी अन्य शब्द के द्वारा या किसी अन्य प्रकार से भी ग्रहण हो तो दूसरे ग्रहण में इदम् और एतद् को एन आदेश हो जाता है । यथा— एव तयोक्ते तमवेक्ष्य किञ्चिद्विस्रंसिदुर्वाङ्कमधूकमाला । ऋजुप्रणामक्रिययैव तन्वी प्रत्यादिदेशैनमभाष्यमाणा ॥ (रघु० ६/२५) यहां प्रथम 'तद्' शब्द से गृहीत होने पर भी पुनर्ग्रहण में इदम् या एतद् को एन आदेश हो जाता है । (यहां मकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दो का विवेचन समाप्त होता है।)

अभ्यास (३६) (१) 'किम्' शब्द ही सर्वनामों में पढ़ा गया है 'क' शब्द नहीं, पुनः के, कस्मै' आदियों में क्या सर्वनामकार्य हो जाते हैं ? (२) 'इदम्' शब्द में स्वतः ही ककार का श्रवण नहीं होता, पुनः उस के वारण के लिये अनाप्यकः में यत्न क्यों किया गया है ? (३) 'अयम्' में त्यदाद्यत्व क्यों नहीं होता ? यदि उस के प्रवृत्त्यभाव का कोई कारण है तो वह 'इमौ, इमे' आदि में क्यों नहीं ? (४) 'पुष्+नाति = पुष्णाति' यहां ष्टुत्व होता है या णत्व ? विवेचन करें । (५) आदि और अन्त का लक्षण लिख कर व्यपदेशिवद्भाव को स्पष्ट करें । (६) अन्वादेश का सोदाहरण स्पष्टीकरण करें । (७) 'नानर्थके० परिभाषा की आवश्यकता पर सोदाहरण एक टिप्पण लिखें । (८) (क) 'प्रशान्' यहां नकार का लोप क्यों नहीं होता ?