भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 392, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 392

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३७७ परे होने पर। अनेकाल् होने से 'एन' आदेश सम्पूर्ण इदम् और एतद् के स्थान पर होगा। अन्वादेश किसे कहते हैं? किसी अज्ञात कार्य को जनाने या विधान करने के लिये जिस का प्रथम एक बार ग्रहण हो चुका हो; यदि पुनः दूसरे अज्ञात कार्य को जनाने या विधान करने के लिये उस का ग्रहण किया जावे तो वह पुनर्ग्रहण 'अन्वादेश' कहाता है। यथा — (१) अनेन व्याकरणम् अधीतम् एनं छन्दोऽध्यापय (इस ने व्या- करण पढ़ लिया है अब इसे छन्दश्शास्त्र पढ़ाओ)। यहां 'व्याकरण पढ़ लिया है' इस कार्य के लिये 'अनेन' का ग्रहण किया गया है। पुनः छन्दोऽध्ययन के लिये भी उस का ग्रहण किया गया है अतः दूसरी वार उस का ग्रहण 'अन्वादेश' हुआ। (२) अनयोः पवित्रं कुलम्, एनयोः प्रभूतं स्वम् (इन दोनों का कुल पवित्र है तथा इन का धन भी बहुत है)। यहां प्रथम पवित्र कुल कहने के लिये ग्रहण किये हुए 'इन दोनों' का पुनः बहुत धन कहने के लिये दोबारा ग्रहण किया गया है अतः यह दूसरी वार वाला ग्रहण 'अन्वादेश' है। इसी प्रकार — इमं बालकं शिक्षामपीपठः, अथो एनं वेदमध्यापय (इस बालक को तुम शिक्षा पढ़ा चुके हो अब इसे वेद पढ़ाओ)। यहां वेद पढ़ाने के लिये पुनः उस का ग्रहण 'अन्वादेश' है। अनेनच्छात्रेण रात्रिरधीता, अथो एनेनाहरप्यधीतम् (इस छात्र ने रात भर पढ़ा और इस ने दिन भर भी पढ़ा)। यहां 'दिन भर भी पढ़ा' यह जनाने के लिये पुनः उस का ग्रहण अन्वादेश है। अनयोश्छात्रयोः शोभनं शीलम्, अथो एनयोः कुशाग्रा मेधा (ये दोनों छात्र अच्छे आचार वाले हैं और इन की बुद्धि भी तीक्ष्ण है)। यहां 'बुद्धि तीक्ष्ण है' यह जनाने के लिये पुनः उन का ग्रहण 'अन्वादेश' है। अन्वादेश में द्वितीया (अम्, औट्, शस्) तथा टा और ओस् (षष्ठी और सप्तमी दोनों के द्विवचन) इन पञ्च प्रत्ययों के परे होने पर इदम् और एतद् शब्द को 'एन' सर्वादेश हो जाता है। अन्य विभक्तियों में अनन्वादेश की भांति रूप चलते हैं¹। 'एतद्' शब्द का वर्णन आगे आयेगा यहां 'इदम्' शब्द प्रस्तुत है— १. इदम् + अम् = एन + अम् = एनम्। २. इदम् + औट् = एन + औ = एनौ। ३. इदम् + शस् = एन + अस् = एनान्। ४. इदम् + टा = एन + आ = एन + इन = एनेन। ५. इदम् + ओस् = एन + ओस् = एनयोः। 'एन' आदेश होकर यहां पुंल्लिङ्ग में रामवत् प्रक्रिया होती है। इन सब का दो श्लोकों में प्राचीन संग्रह यथा— इमं विद्धि हरेर्भक्तं, विद्धयथैनं शिवार्चकम्। इमाविमान् वित्त शैवान्, एनावेनांस्तु वैष्णवान् ॥ १ ॥ १. यद्यपि अन्य विभक्तियों में रूप अनन्वादेश की भाँति होते हैं तो भी प्रक्रिया में बड़ा अन्तर होता है। अन्वादेश में इदम् शब्द के स्थान पर तृतीयादि विभक्तियों में इदमोऽन्वादेशेऽशनुदात्तस्तृतीयादौ (२.४.३२) सूत्र से 'अश्' आदेश हो कर शकार का लोप करने पर अदन्त सर्वनाम की तरह कार्य होते हैं। यह सब सप्रयोजन विस्तारपूर्वक सिद्धान्तकौमुदी में देखें।