लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां 'इन्हन्पूषार्यम्णां शौ (२७४)' नियम से उपधादीर्घ के निषिद्ध होने पर 'सौ च (२८५)' से दीर्घ हो सकार और नकार का लोप हो जाता है। ‡ 'शार्ङ्गिणौ' आदियों में अट्कुप्वाङ्० (१३८) से णत्व हो जाता है। 'हे शार्ङ्गिन् !' में पदान्तस्य (१३६) सूत्र द्वारा णत्वनिषेध होता है। † 'शार्ङ्गिषु' में सुब्विधि न होने से नकार का लोप असिद्ध नहीं होता, अतः णत्व करने में बाधा नहीं होती। इस प्रकार के इन्अन्त शब्द संस्कृतसाहित्य में बहुत हैं। कुछ का बालोपयोगि- सङ्ग्रह नीचे दिया जा रहा है। यह चिह्न णत्वप्रक्रिया का परिचायक है। शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ अनृच्छिन् = ऋणरहित | कृतिन् = पण्डित | नयशालिन् = नीतिज्ञ अनृणिन् = " | केसरिन् = शेर | निवासिन् = रहने वाला अक्षदेविन् = जुआरी | क्रोधिन् = क्रोधी | पक्षिन् = परिन्दा अज्ञानिन् = अज्ञानी | क्षणविध्वंसिन् = क्षणिक | परदेशिन् = विदेशी अतिशायिन् = बढ़ा हुआ | खड्गिन् = गैण्डा | परमेष्ठिन् = ब्रह्मा अधिकारिन्* = अधिकारी | गुणिन् = गुणयुक्त | परिपन्थिन् = शत्रु अधीतिन्¹ = विद्वान् | गृहमेधिन् = गृहस्थी | पादचारिन्* = पैदल अनुजीविन् = सेवक | गृहिन्* = " | पाशिन् = यमराज अनुयायिन् = अनुयायी | गृहीतिन् = समझा हुआ | पिनाकिन् = शिव अन्तेवासिन् = शिष्य | घोणिन् = सूअर | पुष्करिन्* = हाथी आगामिन् = आने वाला | चक्रवर्तिन् = सार्वभौम | प्रकम्पिन् = कापने वाला आततायिन् = दुष्ट | चक्रिन्* = चक्रधारी | प्रणयिन् = प्रेमी उपजीविन् = सेवक | जन्मिन् = प्राणी | प्रतिवेशिन् = पड़ौसी उपयोगिन् = उपयोगी | जम्भभेदिन् = इन्द्र | प्रत्यर्थिन् = शत्रु ऊर्मिमालिन् = समुद्र | ज्ञानिन् = ज्ञानी | प्रवासिन् = परदेश गया एकाकिन् = अकेला | तपस्विन् = तपस्वी | प्राणिन् = प्राणी कञ्चुकिन् = कञ्चुकी | त्यागिन् = त्यागी | फणिन् = फणधर सांप कपटिन् = कपटी | दंष्ट्रिन्* = सूअर | फलिन् = फल वाला पेड़ कपालिन् = महादेव | दण्डिन् = दण्डधारी | बलशालिन् = बलवान् करटिन् = हाथी | दन्तिन् = हाथी | बलिविध्वंसिन् = विष्णु करिन्* = हाथी | दीर्घदर्शिन् = दूरदर्शी | बलिन् = बलवान् कलापिन् = मोर | देहिन् = जीवात्मा | बुद्धिशालिन् = बुद्धि मान् कामिन् = कामी | द्वारिन्* = द्वारपाल | ब्रह्मचारिन्* = ब्रह्मचारी किरणमालिन् = सूर्य | दीपिन् = बाघ | ब्रह्मवादिन् = ब्रह्मवादी कुण्डलिन् = सांप | धनिन् = धनवान् | भागिन् = हिस्सेदार १ इस के योग में सप्तमी विभक्ति का प्रयोग होता है—व्याकरणेऽधीती।