लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३८६ शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ भिक्षाशिन् = भिक्षुक | वनमालिन् = श्रीकृष्ण | शिखण्डिन् = मोर भोगिन् = सांप, राजा | वनवासिन् = वनवासी | शिल्पिन् = कारीगर मनस्विन् = बुद्धिमान् | वशवर्त्तिन् = आज्ञाकारी | शेषशायिन् = विष्णु मनीषिन्* = बुद्धिमान् | वशिन् = वशवर्त्ती | श्रमिन्* = परिश्रमी मन्त्रिन्* = मन्त्री | वाग्मिन् = वाक्पटु | श्रेष्ठिन् = धनवान् मरीचिमालिन् = सूर्य | विटपिन् = वृक्ष | संयमिन् = संयमी मस्करिन्* = संन्यासी | वियोगिन् = विरही | सङ्गिन् = साथी मानिन् = अभिमानी | वीचिमालिन् = समुद्र | सञ्चारिन्* = सञ्चारी मालिन् = मालाधारी | वैरिन्* = शत्रु | सत्यवादिन् = सत्यवादी मुण्डिन् = सिरमुण्डा | व्यभिचारिन्* = दुराचारी | सब्रह्मचारिन्* = सहपाठी मेधाविन् = बुद्धिमान् | व्यवायिन् = व्यभिचारी | सव्यसाचिन् = अर्जुन योगिन् = योगी | व्यापिन् = व्यापक | सहकारिन्* = सहयोगी रथारोहिन्* = रथसवार | व्योमचारिन्* = नभचर | साक्षिन्* = गवाह रूपधारिन्* = रूपधारी | व्रतिन् = व्रत वाला | सादिन् = घुड़सवार रोगिन्* = रोगी | शमिन् = शान्त | स्वामिन् = स्वामी लाङ्गलिन् = बलराम | शरीरिन्* = जीवात्मा | हस्तिन् = हाथी लिङ्गिन् = साधु | शास्त्रदर्शिन् = शास्त्रज्ञ | हितैषिन्* = हितेच्छुक लोभिन् = लोभी | शास्त्रिन्* = शास्त्रज्ञ | नोट— ध्यान रहे कि इन्अन्त शब्दों का इकार, आम् में सदा ह्रस्व ही रहता है। यथा—योगिनाम्, करिणाम्, धनिनाम् आदि। इस की दीर्घता केवल सुँ में ही हुआ करती है—योगी, करी, धनी आदि। समास में नकार का लोप हो कर इकार ह्रस्व ही रहता है। यथा—विटपिनः शाखा—विटपिशाखा। रोगिणश्चर्या—रोगिचर्या। स्त्रीलिङ्ग में इन्अन्त शब्दों का प्रयोग करना हो तो इन के आगे ऋन्नेभ्यो ङीप् (२३२) द्वारा ङीप् प्रत्यय किया जाता है। ङीप् के अनुबन्धों का लोप हो कर 'ई' मात्र अवशिष्ट रहता है। तब इस की रूपमाला गौरीशब्द के समान होती है— योगिनी, योगिन्यौ, योगिन्यः आदि। हिन्दी में इन्अन्त शब्द ईकारान्त के रूप में प्रचलित हैं अतः कई लोग इन को ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग समझने की भूल किया करते हैं। इस से सावधान रहना चाहिये। पूषन् (सूर्य)। पूषन् शब्द श्वन्नुक्षन्पूषन्० (उणा० १५७) इस औणादिक सूत्र द्वारा पुष पुष्टौ (क्र्या० प०) धातु से कनिन्प्रत्ययान्त निपातित होता है। पुष्णातीति पूषा। जगत् को पुष्टि प्रदान करने के कारण सूर्य का नाम 'पूषन्' है। विकर्त्तनाऽर्क-मार्तण्ड-मिहिराऽरुणपूषणः—इत्यमरः। 'पूषन्' शब्द की रूपमाला यथा—