भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 389, कुल 633 में से

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पृष्ठ 389

३७४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

चाहिये। इस पर— नानर्थकेऽलोऽन्त्यविधिरनभ्यासविकारे यह परिभाषा प्रवृत्त हो कर कहती है कि अनर्थक में अलोऽन्त्यस्य (२१) सूत्र प्रवृत्त नहीं हुआ करता, हां १ यदि अभ्यास का विकार अनर्थक हो तो यह (अलोऽन्त्यस्य) प्रवृत्त हो जाता है' । कौन अनर्थक और कौन सार्थक होता है ? इस का निर्णय इस परिभाषा से होता है— समुदायो ह्यर्थवान् तस्यैकदेशोऽनर्थकः । अर्थात् समुदाय ही सार्थक और उस का एक भाग निरर्थक हुआ करता है। तो इस प्रकार 'इदम्' यह सम्पूर्ण समुदाय सार्थक और इस का 'इद्' यह अवयव निरर्थक है। अनर्थक में अलोऽन्त्यविधि नहीं हुआ करती अतः यहां भी दकार का लोप न हो कर सम्पूर्ण इद् भाग का ही लोप हो जायेगा—'अ + भ्याम्' । अब यहां सुपि च (१४१) सूत्र से हम दीर्घ करना अभीष्ट है परन्तु उस से वह हो नहीं सकता, क्योंकि उस के अर्थ में 'अदन्त अङ्ग को दीर्घ हो' ऐसा लिखा है। यहां अत् अङ्ग तो है पर अदन्त (अत् है अन्त में जिसके ऐसा) अङ्ग नहीं है। अतः इस की सिद्धि के लिय अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] परिभाषा सूत्रम्—(२७८) आद्यन्तवदेकस्मिन् ।१।१।२१॥ एकस्मिन् क्रियमाणं कार्यमादाविव अन्त इव च स्यात्। सुपि च (१४१) इति दीर्घः । आभ्याम् ॥ अर्थ —जैसे आदि और अन्त में कार्य होते हैं वैसे एक वर्ण में भी कार्य हों। व्याख्या—आद्यन्तवत् इत्यव्ययपदम् । एकस्मिन् ।७।१। समास —आदिश्च अन्तश्च = आद्यन्तौ, इतरेतरद्वन्द्वः । तयोरिव = आद्यन्तवत् । तत्र तस्येव (११७६) इति वतिप्रत्ययः । अर्थ — (आद्यन्तवत्) आदि और अन्त में जैसे कार्य होते हैं वैसे (एकस्मिन्) एक वर्ण में भी हों । आदि और अन्त शब्द सापेक्ष अर्थात् दूसरे की अपेक्षा या आश्रय करने वाले हैं। जब तक अन्य वर्ण न हों, आदि और अन्त नहीं बन सकते । जैसा कि भाष्य में कहा है—यस्मात्पूर्वं नास्ति परम्‌अस्ति स आदिरित्युच्यते । यस्मात्पूर्वमस्ति परञ्च नास्ति सोऽन्त इत्युच्यते । अर्थात् जिस से पूर्व कोई नहीं, परे है वह—'आदि' तथा जिस के पूर्व तो है, परे नहीं वह—'अन्त' कहलाता है । इस प्रकार आदि और अन्त में विधान किये गये कार्य केवल एक वर्ण में प्राप्त नहीं हो सकते । अतः उन की एक-असहाय वर्ण में भी प्रवृत्ति कराने के लिय यह सूत्र आरम्भ किया गया है। उदाहरण यथा— जैसे 'रामाभ्याम्, पुरुषाभ्याम्' यहां अदन्त अङ्ग को सुपि च (१४१) से दीर्घ होता है वैसे—'अ + भ्याम्' यहां केवल अत् को भी दीर्घ हो कर 'आभ्याम्' बनेगा । आदि का उदाहरण—जैसे 'भविष्यति' यहां वलादि स्य को आर्धधातुकस्येड् वलादे (४०१) से इट् का आगम होता है वैसे 'आतिष्ठाम्, आतिष्ठु' इत्यादियों में केवल 'स्' को भी होगा। १ यथा—बिभर्ति, पिपर्ति आदियों में अभ्यास के अन्त्य ऋकार को इकार आदेश हो जाता है। अन्यथा यहां भी सम्पूर्ण अभ्यास के स्थान पर आदेश होना (देखें भैमीव्याख्या द्वितीय भाग सूत्र ६१०) ।

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