भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 388

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३७३ व्याख्या—अकः ।६।१। इदमः ।६।१। (इदमो मः से) । इदः ।६।१। (इदोऽय् पुंसि से) । अन् ।१।१। आपि ।७।१। विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से) । यहां 'आप्' यह 'टा' के आकार से 'सुप्' के पकार तक प्रत्याहार समझना चाहिये । इस प्रकार तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी, और सप्तमी—इन पञ्च विभक्तियों में स्थित सब प्रत्ययों का 'आप्' शब्द से ग्रहण होता है । नास्ति क् (ककारः) यस्मिन् सः= अकू, तस्य = अकः, बहुव्रीहिसमासः । अर्थः— (अकः) ककार-रहित (इदमः) इदम् शब्द के (इदः) इद भाग के स्थान पर (अन्) अन् आदेश हो (आपि) तृतीयादि (विभक्तौ) विभक्ति परे हो तो । 'इदम्' शब्द में जब अव्ययसर्वनाम्नाकच्प्राक्टेः (१२२६) सूत्र से अकच् प्रत्यय किया जाता है तब वह 'इदकम्' इस प्रकार ककार- सहित हो जाता है। तब 'अन्' आदेश के निषेध के लिये सूत्र में 'अकः' (ककाररहित) कहा है । ध्यान रहे कि 'अन्' आदेश अनेकाल् होने से सम्पूर्ण 'इद' भाग के स्थान पर आदिष्ट होता है । 'इद + आ' यहां प्रकृत-सूत्र से इद भाग को अन् आदेश हो कर--अन् अ + आ = अन + आ हुआ । पुनः टा-ङसिँ-ङसामिनात्स्याः (१४०) सूत्र से आ को इन आदेश तथा आद् गुणः (२७) द्वारा गुण एकादेश करने पर 'अनेन' प्रयोग सिद्ध होता है । 'इदम् + भ्याम्' यहां त्यदाद्यत्व तथा पररूप हो कर 'इद + भ्याम्' इस स्थिति में अनाप्यकः (२७६) सूत्र से अन् आदेश प्राप्त होता है । इस पर अग्रिम अपवादसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (२७७) हलि लोपः ।७।२।११३॥ अककारस्येदम इदो लोपः स्यादापि हलादौ । नानर्थकेऽलोऽन्त्यविधिर- नभ्यासविकारे (प०) ॥ अर्थः—तृतीयादि हलादि विभक्ति परे हो तो ककाररहित इदम् शब्द के इद भाग का लोप हो जाता है । नानर्थक इति—अभ्यासविकार को छोड़ कर अन्यत्र अन- र्थकों में अलोऽन्त्यस्य (२६) सूत्र प्रवृत्त नहीं होता । व्याख्या—अकः ।६।१। (अनाप्यकः से) । इदमः ।६।१। (इदमो मः से) । इदः ।६।१। (इदोऽय् पुंसि से) । लोपः ।१।१। आपि ।७।१। (अनाप्यकः से) । हलि ।७।१। विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से) । 'हलि' यह 'विभक्तौ' पद का विशेषण है और साथ ही सप्तम्यन्त अल् भी है अतः यस्मिन्विधिस्तदादावल्० से तदादिविधि हो जाती है । अर्थः—(अकः) ककाररहित (इदमः) इदम् शब्द के अवयवं (इदः) इद का (लोपः) लोप हो जाता है (हलि = हलादौ) हलादि (आपि) तृतीयादि विभक्ति परे हो तो । यह सूत्र पिछले अनाप्यकः (२७६) सूत्र का अपवाद है । 'इद + भ्याम्' यहां 'भ्याम्' यह तृतीयादि हलादि विभक्ति परे है अतः यहां अनाप्यकः (२७६) सूत्र का बाध कर हलि लोपः (२७७) सूत्र से 'इद' का लोप प्राप्त होता है । परन्तु अलोऽन्त्यस्य (२१) सूत्र से इद के अन्त्य दकार का लोप होना