भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 387

३७२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२७५) दश्च ।७।२।१०६॥ इदमो दस्य मः स्याद्विभक्तौ । इमौ । इमे । त्यदादेः सम्बोधनं नास्ती- त्युत्सर्गः ॥ अर्थः—विभक्ति परे होने पर इदम् शब्द के दकार को मकार आदेश हो । त्यदादेरिति—सामान्यतया त्यद् आदि शब्दों का सम्बोधन नहीं होता । व्याख्या—विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से) । इदम् ।६।१। म ।१।१। (इदमो मः से । मकारादकार उच्चारणार्थः) । दः ।६।१। च इत्यव्ययपदम् । अर्थ— (विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (इदमः) इदम् शब्द के (दः) द् के स्थान पर (मः) म् आदेश हो । 'इद + औ' यहां विभक्ति 'औ' परे है अतः प्रकृतसूत्र से दकार को मकार हो कर 'इम+औ' हुआ । अब रामशब्दवत् पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होने पर नादिचि (१२७) सूत्र से उस का निषेध हो जाता है । पुनः वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एकादेश करने पर 'इमौ' प्रयोग सिद्ध होता है । 'इदम् + अस्' (जस्) । यहां त्यदाद्यत्व, पररूप तथा दश्च (२७५) सूत्र से दकार को मकार आदेश हो कर 'इम + अस्' हुआ । अब एकदेशविकृतन्याय से 'इम' शब्द की भी सर्वादीनि सर्वनामानि (१५१) से सर्वनामसञ्ज्ञा हो जाती है । तब जसः शी (१५२) से जस् को शी आदेश हो कर अनुबन्धलोप तथा गुण एकादेश करने पर—'इमे' प्रयोग सिद्ध होता है । त्यदादियों [त्यद्, तद्, यद्, एतद्, इदम्, अदम्, एक, द्वि, युष्मद्, अस्मद्, भवतु, किम्] का सम्बोधन प्रायः नहीं हुआ करता । 'प्रायः' इसलिये कहा है कि भाष्य में कहीं २ 'हे स' आदि प्रयोग भी प्राप्त होते हैं । मूल का अक्षरार्थ यह है—(त्य- दादेः) त्यदादिगण का (सम्बोधनम्) सम्बोधन (नास्ति) नहीं होता (इति) यह (उत्सर्गः) सामान्य नियम है । 'इदम्' शब्द के सम्बोधन में भी वही रूप बनेंगे जो उस के प्रथमा में बनते हैं । परन्तु लोक में इन का प्रयोग कहीं नहीं देखा जाता । 'इदम् + अम्' यहां त्यदाद्यत्व, पररूप, दश्च (२७५) से दकार को मकारादेश तथा अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप करने पर 'इमम्' प्रयोग सिद्ध होता है । 'इदम् + अस् (शस्) । त्यदाद्यत्व, पररूप, दकार को मकारादेश तथा पूर्वसवर्ण- दीर्घ कर सकार को नकारादेश करने से 'इमान्' प्रयोग सिद्ध होता है । 'इदम् + आ' (टा) । यहां त्यदाद्यत्व तथा पररूप हो कर 'इद + आ' इस स्थिति में अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२७६) अनाप्यकः ।७।२।११२॥ अककारस्येदम इदोऽन् आपि विभक्तौ । आप् इति प्रत्याहारः । अनेन ॥ अर्थ —ककाररहित इदम् शब्द के 'इद्' भाग को 'अन्' आदेश हो तृतीयादि विभक्ति परे हो तो ।