लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३७१ इस सूत्र से 'इदम् + स्' यहां अत्व नहीं होता । अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम् — (२७३) इदोऽय् पुंसि ।७।२।१११॥ इदम इदोऽय् स्यात्सौ पुंसि । सोर्लोपः । अयम् । त्यदाद्यत्वे— अर्थः — सुं परे हो तो पुंल्लिङ्ग में 'इदम्' के 'इद्' को 'अय्' आदेश हो । व्याख्या—इदमः ।६।१। (इदमो मः से) । इदः ।६।१। अय् ।१।१। पुंसि ।७।१। सौ ।७।१। (यः सौ से) । अर्थः—(सौ) सुं परे होने पर (पुंसि) पुंल्लिङ्ग में (इदमः) इदम् शब्द के अवयव (इदः) इद् के स्थान पर (अय्) अय् आदेश हो । अनेकाल्परि- भाषा द्वारा अय् आदेश सम्पूर्ण इद् के स्थान पर होगा । ग्रहणसामर्थ्य से यकार का लोप न होगा, किञ्च प्रयोजनाभाव से इत्सञ्ज्ञा भी न होगी¹ । 'इदम् + स्' यहां पुंल्लिङ्ग में प्रकृतसूत्र से इद् को अय् आदेश हो कर 'अय् अम् + स्' हुआ । अब हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सकार का लोप करने पर 'अयम्' प्रयोग सिद्ध होता है । 'इदम् + औ' यहां सुं परे नहीं है अतः इदमो मः (२७२) प्रवृत्त न होगा, त्यदादीनामः (१६३) सूत्र से मकार को अकार आदेश हो कर 'इद अ + औ' हुआ । अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (२७४) अतो गुणे ।६।१।९७॥ अपदान्तादतो गुणे पररूपमेकादेशः ॥ अर्थः—अपदान्त अत् से गुण परे हो तो पूर्वपर के स्थान पर पररूप एकादेश हो। व्याख्या—अपदान्तात् ।५।१। (उस्यपदान्तात् से) । अतः ।५।१। गुणे ।७।१। पूर्वपरयोः ।६।२। एकम् ।१।१। (एकः पूर्व-परयोः यह अधिकृत है) । पररूपम् ।१।१। (एङि पररूपम् मे) । अर्थः—(अपदान्तात्) अपदान्त (अतः) अत् से परे (गुणे) गुणसञ्ज्ञक वर्ण हो तो (पूर्व-परयोः) पूर्व + पर के स्थान पर (एकम्) एक (पर- रूपम्) पररूप आदेश हो । अदेङ् गुणः (२५) के अनुसार 'अ, ए, ओ' ये तीन वर्ण गुणसञ्ज्ञक हैं । यह सूत्र सवर्णदीर्घ तथा वृद्धि आदि का अपवाद है । उदाहरण यथा — पच् + अन्ति = पच् 'अ' न्ति = पचन्ति । यज् + अन्ति = यज् 'अ' न्ति = यजन्ति । एध + ए = एध् 'ए' = एधे । यदि अत् पदान्त होगा तो पररूप न होगा । यथा—दैत्य + अरि = दैत्यारिः, दीर्घ + एकार = दीर्घेकारः । दीर्घ + ओकार = दीर्घौकारः । इन में समास के कारण विभक्ति का लुक् होने से प्रत्ययलक्षण के कारण अत् पदान्त है । अतः पररूप नहीं होता । 'इद अ + औ' यहां दकारोत्तर अपदान्त अत् से परे 'अ' यह गुण विद्यमान है; अतः पूर्व (अ) और पर (अ) दोनों के स्थान पर एक पररूप 'अ' हो कर 'इद + औ' हुआ । अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— १. पुंसीति किम् ? इयं ब्राह्मणी । साविति किम् ? इमौ पुत्रौ ।