भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 390, कुल 633 में से

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पृष्ठ 390

हलन्त-पुलिंङ्ग-प्रकरणम् ३७५ नोट—भाष्यकार ने इस सूत्र को और अधिक विस्तृत करने के लिये व्यप- देशिवदेकस्मिन् ऐसा लिखा है। मुख्यव्यवहार को 'व्यपदेश' कहते हैं। व्यपदेशोऽस्या- स्तीति व्यपदेशी, व्यपदेश वाले का नाम 'व्यपदेशी' हुआ। अर्थात् मुख्य का नाम 'व्यप- देशी' है। उस मुख्य के समान एक में भी कार्य हो जाते हैं। यथा—एकाचो वशो भष्० (२५३) का मुख्य उदाहरण 'गर्दभ्' है। यहां गर्दभ् धातु का अवयव एकाच् भषन्त 'दभ्' है। परन्तु 'धुक्' यहां ऐसा नहीं। यहां धातु भी वही है और एकाच् भषन्त भी वही है, अर्थात् दोनों अभिन्न हैं, इस में भी मुख्य के समान कार्य हो जाएंगे। ये उदाहरण पाणिनि के आद्यन्तवदेकस्मिन् सूत्र से सिद्ध नहीं हो सकते थे अतः भाष्य- कार को व्यपदेशिवदेकस्मिन् इस प्रकार रचना पड़ा। शास्त्र में इसे ही व्यपदेशिवद्भाव कहा गया है। व्यपदेशिवद्भाव का अर्थ गौण को भी मुख्य के समान मानना है। 'इदम् + भिस्' यहां त्यदाद्यत्व, पररूप, हलि लोपः (२७७) से इद का लोप हो 'अ+भिस्' इस स्थिति में व्यपदेशिवद्भाव से अतो भिस ऐस् (१४२) द्वारा भिस् को ऐस् प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र निषेध करता है— [लघु०] निषेध-सूत्रम्—(२७६) नेदमदसोरकोः ।७।१।११॥ अककारयोरिदमदसोर्भिस ऐस् न । एभिः । अस्मै । एभ्यः । अस्मात् । अस्य । अनयोः २ । एषाम् । अस्मिन् । एषु ॥ अर्थः—ककाररहित इदम् और अदस् शब्द के भिस् को ऐस् नहीं होता । व्याख्या—अकोः ।६।२। इदमदसोः ।६।२। भिसः ।६।१। ऐस् ।१।१। (अतो भिस ऐस् से) । न इत्यव्ययपदम् । नास्ति क् ययोस्तौ = अको, तयोः = अकोः, बहुव्रीहि- समासः । अर्थः—(अकः) ककाररहित (इदमदसोः) इदम् और अदस् शब्द के (भिसः) भिस् के स्थान पर (ऐस्) ऐस् (न) न हो । 'अ+भिस्' यहां प्रकृतसूत्र से भिस् को ऐस् न हुआ । तब बहुवचने झल्येत् (१४५) से एत्व हो सकार को रुत्व विसर्ग करने से 'एभिः' प्रयोग बना । चतुर्थी के एकवचन में 'इदम् + ए' (ङे) = इद + ए । इस अवस्था में सर्वनाम्नः स्मै (१५३) सूत्र से एकार को स्मै आदेश तथा अनाप्यकः (२७६) से इद् को अन् आदेश युगपत् प्राप्त होते हैं । विप्रतिषेधपरिभाषा से परकार्य अन् आदेश होने योग्य है । परन्तु वह अनिष्ट है । इस के लिये परिभाषा प्रवृत्त होती है—पूर्व-पर- नित्याऽन्तरङ्गाऽपवादानामुत्तरोत्तरं बलीयः (प०) । अर्थात् पूर्व से पर, पर से नित्य, नित्य से अन्तरङ्ग और अन्तरङ्ग से अपवाद बलवान् होता है। नित्य उसे कहते हैं कि जो अपने विरोधी के प्रवृत्त होने पर भी प्रवृत्त हो सके । यथा—यहां 'स्मै' आदेश नित्य है क्योंकि यह अपने विरोधी अन् आदेश के प्रवृत्त हो जाने पर भी प्रवृत्त हो सकता है । पर से नित्य बलवान् होता है अतः अनाप्यकः (७.२.११२) के परे होने पर भी सर्वनाम्नः स्मै (७.१.१४) सूत्र के नित्य होने से स्मै आदेश हो जाता है । तब 'इद + स्मै' इस स्थिति में हलि लोपः (२७७) से इद् भाग का लोप हो कर 'अस्मै' प्रयोग सिद्ध होता है ।