लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
अव्यवहित पूर्व झल् को ही जश् होगा, अर्थात् झश् परे होने पर झलों को जश् होगा¹। झल् प्रत्याहार में वर्गों के चतुर्थ, तृतीय, द्वितीय, प्रथम और ऊष्म वर्ण आते हैं। इनके स्थान पर जश् अर्थात् वर्गों के तृतीय वर्ण [ ज्, ब्, ग्, ड्, द् ] हो जाते हैं, यदि झश् अर्थात् वर्गों के तृतीय या चतुर्थ वर्ण परे हों तो। 'सु ध् ध् य्+उपास्य' यहां द्वित्व वाले पक्ष में इस सूत्र से पूर्व धकार=झल् को जश् होता है, क्योंकि इस से परे परला धकार = झश् विद्यमान है। जश् पांच हैं—१ ज्, २ ब्, ३ ग् ४ ड्, ५ द्। यहां स्थानेऽन्तरतम (१७) के अनुसार धकार के स्थान पर दकार=जश् होता है [देखें—लृ-तुल-सानां दन्ता.]। यथा— (१) सुद्ध्य् + उपास्य [द्वित्वपक्ष में जश्त्व होकर] (२) सुध्य् + उपास्य [द्वित्वाभावपक्ष में] अब दोनों पक्षों में समान रूप से अग्रिम-सूत्र प्राप्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम् —(२०) संयोर्गान्तस्य लोपः ।८।२।२३॥ संयोगान्तं यत् पदं तस्य लोपः स्यात् ॥ अर्थः—जिस पद के अन्त में संयोग हो उस का लोप हो जाता है। व्याख्या—संयोगान्तस्य ।८।२। पदस्य ।८।२। (यह अधिकार पीछे से आ रहा है)। लोपः ।१।१। समास —संयोगोऽन्ते यस्य तत् = संयोगान्तम्, बहुव्रीहि-समास । अर्थ —(संयोगान्तस्य) जिस के अन्त में संयोग है ऐसे (पदस्य) पद का (लोपः) लोप हो जाता है। पाणिनीय-व्याकरण में येन विधिरुतदन्तस्य (१.१.७१) यह भी एक परिभाषा है। इस का भाव यह है कि विशेषण के साथ तदन्त-विधि करनी चाहिये। यथा— अचो यत् (७७३) यहां 'धातोः' पद की अनुवृत्ति आकर 'अचः ।३।१। धातोः ।३।१। यत् ।१।१।' ऐसा हो जाता है। इस में 'अचः' पद 'धातोः' पद का विशेषण है, इस से तदन्त-विधि होकर अजन्त धातु से यत् प्रत्यय हो' ऐसा अर्थ बन जाता है। इस नियम के अनुसार यहां यदि 'संयोगस्य लोपः' सूत्र भी बनाते, तो भी 'संयोगस्य' पद के 'पदस्य' पद के विशेषण होने के कारण तदन्त विधि होकर उपर्युक्त अर्थ सिद्ध हो सकता था, पुनः यहां स्पष्ट-प्रतिपत्ति अर्थात् विद्यार्थियों के क्लेश का ध्यान रख अनायास-ज्ञान के लिये ही मुनि ने 'अन्त' पद का ग्रहण किया है। सुद्ध्य् + उपास्य, सुध्य् + उपास्य इन रूपों में क्रमशः 'सुद्ध्य्' और 'सुध्य्' संयोगान्त पद हैं। हलोऽनन्तराः संयोगः (१३) के अनुसार 'द्, ध्, य्' अथवा 'ध्, य्' वर्णों की संयोग संज्ञा है। सुप्तिङन्तं पदम् (१४) सूत्र द्वारा यहां पद-संज्ञा होती है। यद्यपि इसके अन्त में भिस् = सुप् लुप्त हो चुका है, तथापि प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम्
१. इस कारण परले 'ध्' को जश् नहीं होगा, क्योंकि समक्षस्थित 'य्' झश् नहीं है।