लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् आदि सप्तम्यन्त पदों के होने पर—ऐसा होता है] । इति ऽप्यव्ययपदम् । निर्दिष्टे ।७।१। पूर्वस्य ।६।१। इति शब्द पद के अर्थ को उल्टा कर दिया करता है, अर्थात् इस के जोड़ने से शब्दपरक पद अर्थपरक और अर्थपरक पद शब्दपरक हो जाते हैं । यथा—‘वृक्ष’ इस पद का अर्थ लोक में विद्यमान पदार्थ विशेष है, अतः यह अर्थपरक है । अब यदि इस के आगे ‘इति’ शब्द जोड़ दें ‘वृक्ष इति’, तो इस का अर्थ ‘वृक्ष’ यह लिखा हुआ शब्द हो जायेगा । शब्दपरक पद से अर्थपरक पद हो जाना नवेति विभाषा (१ १ ४३) सूत्र में सिद्धान्तकौमुदी में देखें । तो अब यहां ‘तस्मिन्’ इस लुप्तसप्तम्यन्त पद का अर्थ—इको यणचि (१५) आदियों में स्थित ‘अचि’ आदि सप्तम्यन्त पदों के होने पर —ऐसा था । ‘इति’ के जोड़ने से यह शब्द-परक से अर्थ परक हो गया, अर्थात् इस का अर्थ “इको यणचि आदियों में स्थित ‘अचि’ आदि सप्तम्यन्त पदों के अर्थों के होने पर” ऐसा हो गया । ‘निर्दिष्टे’ पद ‘तस्मिन्’ पद का विशेषण है । निर्’ का अर्थ निरन्तर और ‘दिश्’ धातु का अर्थ ‘उच्चारण करना’ है । तो इस प्रकार ‘निर्दिष्टे’ पद का अर्थ ‘निरन्तर उच्चरित होने पर’ ऐसा हो जाता है । ‘तस्मिन्’ और ‘निर्दिष्टे’ इन दोनों पदों में भाव-सप्तमी है । भाव-सप्तमी का अर्थ ‘होने पर’ ऐसा हुआ करता है । इसे ‘सति सप्तमी’ भी कहते हैं । यह यस्य च भावेन भावलक्षणम् (२ ३ ३७) सूत्र से विधान की जाती है, यथा—‘गच्छत्सु बाल- केषु त्वं स्थित’ यहां भाव-सप्तमी है । इस प्रकार इस सूत्र का यह अर्थ हुआ— (तस्मिन्निति) इको यणचि आदि सूत्रों में स्थित ‘अचि’ आदि सप्तम्यन्त पदों के अर्थों के (निर्दिष्टे) निरन्तर उच्चरित होने पर (पूर्वस्य) पूर्व के स्थान पर [कार्य होता है] । यदि सप्तम्यन्त पद के अर्थ से व्यवधान-रहित पूर्व को कार्य करेंगे तो तभी वह सप्तम्यन्त पद का अर्थ निरन्तर उच्चरित हो सकेगा । अतः निरन्तर कथन से यह प्राप्त हुआ कि ‘सप्तम्यन्त पदार्थ के उच्चरित होने पर उस में व्यवधान-रहित पूर्व के स्थान पर कार्य हो’ । यथा—इको यणचि (१५) सूत्र में ‘अचि’ यह सप्तम्यन्त पद है । इस सप्त- म्यन्त पद का अर्थ यहां ‘सुधी + उपास्य’ में सकारोत्तर उकार, धकारोत्तर ईकार, ‘उपास्य’ शब्द का आदि उकार तथा पकारोत्तर आकार है । अब हमें इन में से ऐसा सप्तम्यन्त पदार्थ चुनना है, जिस से अव्यवहित पूर्व इक् हो; हम उसी इक् के स्थान पर ही यण् करेंगे । तो ऐसा सप्तम्यन्त पदार्थ यहां ‘उपास्य’ शब्द के आदि वाले उकार के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं हो सकता, क्योंकि अन्यों से पूर्व अव्यवहित इक् नहीं है । तथाहि—पकारोत्तर आकार को यदि सप्तम्यन्त पदार्थ अच् मानें तो उस से अव्यवहित पूर्व ‘उपास्य’ शब्द का उकार नहीं होता; पकार का व्यवधान