लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 50, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ेंअच्-सन्धि-प्रकरणम् ३५
'सुधोभिरुपास्यः' इस तृतीयातत्पुरुषममास में सुपो धातुप्रातिपदिकयोः (७२१) से भिस् और सुं का लुक् होने पर 'सुधी+-उपास्य' यह रूप हुआ । अब यहां समास के कारण संहिता का विषय स्पष्ट है जैसा कि कहा गया है— संहितैकपदे नित्या, नित्या धातूपसर्गयोः । नित्या समासे, वाक्ये तु सा विवक्षामपेक्षते ॥ एकपद अर्थात् अखण्डपद में; धातु और उपसर्ग में तथा समास में संहिता नित्य करनी चाहिये; वाक्य में संहिता करना 'वक्ता' (यह उपलक्षणार्थ है, 'लेखक' भी समझ लेना चाहिये) की इच्छा पर निर्भर है, चाहे करे या न करे । इन के उदा- हरण यथा--चयः, जयः । यहां 'चे+अ' 'जे+अ' इस अवस्था में अयादेश एकपद होने के कारण नित्य होता है । 'प्र+एति' यहां धातु और उपसर्ग में नित्य संहिता होने से वृद्धि हो कर नित्य 'प्रैति' रूप ही बनेगा । 'गजेन्द्रः' यहां 'गजानामिन्द्रः' इस प्रकार का समास होने से नित्य गुणादेश होगा । 'नाहं वेद्मि' यहां वाक्य होने से 'न अहं वेद्मि' या 'नाहं वेद्मि' दोनों प्रयोग शुद्ध हैं; वक्ता चाहे जिस का प्रयोग करे । 'सुधी+उपास्य' यहां समास है; अतः संहिता नित्य होगी । इस प्रकार संहिता का विषय होने पर इको यणचि (१५) सूत्र प्रवृत्त हुआ । यहां सकार-में उकार, धकार में ईकार तथा 'उपास्य' शब्द का आदि उकार इक् हैं । यदि सकारस्थ उकार = इक् को यण् करें तो धकारस्थ ईकार = 'अच्' विद्यमान है । यदि धकारस्थ ईकार = इक् को यण् करें तो सकारस्थ उकार या 'उपास्य' शब्द का आदि उकार = 'अच्' विद्यमान है तथा यदि 'उपास्य' शब्द के आदि उकार = इक् को यण् करें तो पकारस्थ आकार या विपरीत दिशा में धकारस्थ ईकार = अच् विद्यमान रहता है । तो अब यह शङ्का उत्पन्न होती है कि किस अच् के विद्यमान रहते किस इक् के स्थान पर यण् किया जाये ? इस शङ्का की निवृत्ति के लिये अग्रिमसूत्र लिखते हैं— [लघु०] परिभाषा-सूत्रम् — (१६) तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य ।१।१।६५॥ सप्तमीनिर्देशेन विधीयमानं कार्यं वर्णान्तरेणाऽव्यवहितस्य पूर्वस्य बोध्यम् ॥ अर्थः - सप्तम्यन्त के निर्देश से क्रियमाण कार्य अन्य वर्णों के व्यवधान से रहित पूर्व के स्थान पर जानना चाहिये । व्याख्या - तस्मिन् = सप्तम्यन्तानुकरणं लुप्तसप्तम्येकवचनान्तम्¹ । [इको यणचि (१५) आदियों में स्थित 'अचि' आदि सप्तम्यन्त पदों का अनुकरण यहां 'तस्मिन्' शब्द से किया गया है। इसके आगे सप्तमी विभक्ति का सुपां सुलुक्० (७.१.३६) सूत्र से लुक् हुआ २ है। इस का अर्थ - इको यणचि (१५) आदियों में स्थित 'अचि' १. 'तस्मिन्' इत्यत्र नागेशस्तु 'अची'त्यादि-सप्तम्यन्तार्थकत्तच्छब्दात् सप्तमीति मन्यते ।