भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 633 में से

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अथाऽच्सन्धि-प्रकरणम् अब अचों की सन्धि का प्रकरण प्रारम्भ किया जाता है । इस प्रकरण में अचों अर्थात् स्वरों का प्रायः स्वरों के साथ मेल दिखाया जायेगा । [लघु०] विधि-सूत्रम्— (१५) इको यणचि ।६।१।७४॥ इकः स्थाने यण् स्यादचि संहितायां विषये । 'सुधी + उपास्य' इति स्थिते— अर्थ — संहिता के विषय में अच् के विद्यमान होने पर इक् के स्थान पर यण् हो जाता है । 'सुधी + उपास्य' ऐसा स्थित होने पर (अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है) । व्याख्या — इक् ।६।१। यण् ।१।१। अचि — भावसप्तम्यन्तम्¹ । संहितायाम्— विषयसप्तम्यन्तम् (संहितायाम् यह पीछे से अधिकार चला आ रहा है) । महामुनि पाणिनि ने अपने सूत्रों का अर्थज्ञान कराने के लिए कुछ विशेष नियम बनाये हैं, जो कि अष्टाध्यायी के प्रथमाध्याय के प्रथमपाद के अन्तर्गत हैं, यह हम पीछे कह चुके हैं। उन में षष्ठी स्थानेयोगा (१ १ ४८) यह भी एक नियम है। इस का तात्पर्य यह है कि इस शास्त्र में षष्ठीविभक्ति का अर्थ 'स्थान पर' ऐसा करना चाहिये । यथा— 'इक' ।६।१। इस का अर्थ हुआ इक् के स्थान पर' । 'एच' ।६।१। इस का अर्थ हुआ 'एच् के स्थान पर' । परन्तु यह नियम वहां लागू नहीं होगा, जहां सम्बन्ध पहले से नियत किया गया होगा । यथा — ऊद् उपधाया गोहः ( ६ ४ ८६) । ऊठ् ।१।१। उप- धाया ।६।१। गोहः ।६।१। यहां गोह् का सम्बन्ध उपधा से नियत किया गया है, अतः यहाँ स्थानषष्ठी का प्रसङ्ग न होगा । इस विषय का विस्तार काशिका (अष्टाध्यायी की सुप्रसिद्ध व्याख्या) आदि में देखना चाहिये । यहां 'इक' इस में स्थानषष्ठी है इस से 'इक् के स्थान पर' ऐसा इस का अर्थ होगा । 'अचि' यहां भावसप्तमी या सति- सप्तमी है² । अर्थ — (इकः) इक् के स्थान पर (यण्) यण् होता है (अचि) अच् होने पर (संहितायाम्) संहिता के विषय में । अच् विद्यमान हो तो संहिता के विषय में अर्थात् संहिता करने की इच्छा होने पर इक् (इ, उ, ऋ, ऌ) के स्थान पर यण् (य्, व्, र्, ल्) करना चाहिये । यहां यण् विधान किया गया है, अतः यह अण् प्रत्याहार के अन्तर्गत होता हुआ भी अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्यय (११) से अपने सवर्णियों (अनुनासिक यँ, वँ, लँ वर्णों) का ग्राहक नहीं होगा । इक् और अच् दोनों अविधीयमान अण् हैं, अतः ये अपने सवर्णियों के ग्राहक होंगे । १ नवीनास्त्वत्र औपश्लेषिकाधारे सप्तमीत्याहुः । तन्मतं शेखरादौ द्रष्टव्यम् । २ यह सप्तमी यस्य च भावेन भावलक्षणम् ( २ ३ ३७) सूत्र से विधान की जाती है । इस सप्तमी का 'विद्यमान होने पर' या 'होने पर' ऐसा अर्थ होता है । इस का विवेचन इस व्याख्या के तृतीयभागस्थ कारक प्रकरण (पृ० ३४६) पर देखें।

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