लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां प्राय कण्ठ के ही निकट होता है । अच् से परे तथा ककार खकार से पूर्व 'ᳵ' ऐसा चिह्न जिह्वामूलीय का होता है इस का विवेचन आगे इसी प्रकरण में मूल में ही किया जायेगा । [लघु०] नासिकाऽनुस्वारस्य ॥ अर्थ —अनुस्वार का नासिका-स्थान होता है । व्याख्या—नासिका ।१।१। अनुस्वारस्य ।६।१। अच् से परे '—' इस प्रकार के चिह्न को 'अनुस्वार' कहते हैं । इस का विवेचन आगे मूल में ही किया जायेगा । [लघु०] इति स्थानानि ॥ अर्थः—ये स्थान समाप्त हुए । [लघु०] यत्नो द्विधा, आभ्यन्तरो बाह्यश्च । आद्यः पञ्चधा, स्पृष्टेषत्स्पृष्टे- षद्द्विवृतविवृतसंवृतभेदात् । तत्र स्पृष्टं प्रयत्नं स्पर्शानाम् । ईषत्स्पृष्टमन्त - स्थानाम् । ईषद्विवृतमूष्मणाम् । विवृतं स्वराणाम् । ह्रस्वस्यावर्णस्य प्रयोगे संवृतम् । प्रक्रिया-दशायान्तु विवृतमेव ॥ अर्थ.—यत्न दो प्रकार का होता है, एक 'आभ्यन्तर' और दूसरा 'वाह्य' । पहला आभ्यन्तर-यत्न पांच प्रकार का होता है, १ स्पृष्ट, २ ईषत्स्पृष्ट, ३ ईषद्विवृत, ४ विवृत, ५ संवृत । इन में से स्पृष्ट-प्रयत्न स्पर्श अक्षरों का होता है । ईषत्स्पृष्ट- प्रयत्न अन्त स्थ अक्षरों का होता है । ईषद्विवृत-प्रयत्न ऊष्म अक्षरों का होता है । स्वरों का विवृत-प्रयत्न होता है । ह्रस्व अवर्ण का उच्चारण-काल में संवृत-प्रयत्न और प्रयोग-सिद्धि के समय केवल विवृत-प्रयत्न होता है । व्याख्या—कोशिश को 'यत्न' कहते हैं । वह यत्न यहां दो प्रकार का होता है । एक वर्ण की उत्पत्ति से पूर्व और दूसरा वर्ण की उत्पत्ति के पश्चात् । जो यत्न वर्णोत्पत्ति से पूर्व किया जाता है उसे 'आभ्यन्तर' तथा जो वर्णोत्पत्ति के अनन्तर किया जाता है उसे 'बाह्य' कहते हैं । इन में प्रथम 'आभ्यन्तर' यत्न पांच प्रकार का होता है। यथा—१ स्पृष्ट, २ ईषत्स्पृष्ट, ३ ईषद्विवृत, ४ विवृत, ५ संवृत । वर्णों की उत्पत्ति में जिह्वा के अग्र, उपाग्र, मध्य तथा मूल भागों का उपयोग हुआ करता है । जिह्वा का स्थान को छूना 'स्पृष्ट', थोड़ा छूना 'ईषत्स्पृष्ट', थोड़ा दूर रहना 'ईषद्विवृत', दूर रहना 'विवृत' तथा हट कर समीप रहना 'संवृत' यत्न कहलाता है । स्पर्श अर्थात् 'क्' से लेकर 'म्' पर्यन्त वर्णों का 'स्पृष्ट' प्रयत्न है, अर्थात् इन के उच्चारण में जिह्वा (यह उपलक्षणमात्र है, पवर्ग के उच्चारण में ओष्ठ भी समझ लेना चाहिये) को स्थान के साथ स्पर्शरूप यत्न करना पड़ता है । अन्त स्थ अर्थात् य्, व्, र्, ल् वर्णों का 'ईषत्स्पृष्ट' प्रयत्न है, अर्थात् इन के उच्चारण में जिह्वा (ओष्ठ भी) को स्थान के साथ थोड़ा स्पर्शरूप यत्न करना पड़ता है । ऊष्म अर्थात् श्, ष्, स्, ह् वर्णों का 'ईषद्विवृत' प्रयत्न है, अर्थात् इन के उच्चारण में जिह्वा को स्थान से