भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 38

संज्ञा-प्रकरणम् २३ व्याख्या — उपूपध्मानीयानाम् ।६।३। ओष्ठौ ।१।२। समासः — उश्च पुश्च उपध्मानीयश्च उपूपध्मानीयाः, तेषाम् = उपूपध्मानीयानाम् । इतरेतरद्वन्द्वः । अच् से परे तथा पकार फकार से पूर्व '≍' इस प्रकार उपध्मानीय होता है । इस का विवेचन आगे उसी प्रकरण में किया जायेगा । [लघु०] ञ-म-ङ-ण-नानां नासिका च ॥ अर्थः—ञ्, म्, ङ्, ण्, न् इन पाञ्च वर्णों का 'नासिका' स्थान भी होता है । व्याख्या—ञमङणनानाम् ।६।३। नासिका ।१।१। च इत्यव्ययपदम् । समासः— ञश्च मश्च ङश्च णश्च नश्च = ञमङणनाः, तेषाम् = ञमङणनानाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । आदिश्चकार उच्चारणार्थः । यहाँ मूल में 'च' ग्रहण का यह प्रयोजन है कि इन वर्णों का अपने-अपने वर्गों का स्थान भी होता है। यथा - ञकार का तालुस्थान और नासिकास्थान दोनों हैं । उस प्रकार मकारादि में भी समझ लेना चाहिये । [लघु०] एदैतोः कण्ठ-तालु ॥ अर्थः—बारह प्रकार के एकार तथा ऐकार का कण्ठ और तालु स्थान होता है । व्याख्या—एदैतोः ।६।२। कण्ठतालु ।१।१। एच ऐच्च = एदैतौ, तयोः= एदैतोः, इतरेतरद्वन्द्वः । कण्ठश्च तालु च = कण्ठतालु । प्राण्यङ्गत्वात् समाहार-द्वन्द्वः । मूल में तकार सुखपूर्वक उच्चारण के लिये ग्रहण किया गया है, इसे तपर नहीं समझना चाहिये । [लघु०] ओदौतोः कण्ठोष्ठम् ॥ अर्थः—बारह प्रकार के ओकार तथा औकार का 'कण्ठ' और 'ओष्ठ' स्थान होता है । व्याख्या—ओदौतोः ।६।२। कण्ठोष्ठम् ।१।१। समासः—ओच्च औच्च ओदौतौ, तयोः = ओदौतोः, इतरेतर-द्वन्द्वः । कण्ठश्च ओष्ठौ च कण्ठोष्ठम्, प्राण्यङ्गत्वात् समा- हारद्वन्द्वः । ओत्वोष्ठयोः समासे वा इति वार्तिकेन पररूपता । यहां भी मूल में तकार मुख-सुखार्थ ही समझना चाहिये । [लघु०] वकारस्य दन्तोष्ठम् ॥ अर्थः—वकार का दन्त और ओष्ठ स्थान होता है । व्याख्या—वकारस्य ।६।१। दन्तोष्ठम् ।१।१। समासः—दन्ताश्च ओष्ठौ च = दन्तोष्ठम्, प्राण्यङ्गत्वात् समाहारद्वन्द्वः । ओत्वोष्ठयोः समासे वा इति वार्तिकेन पररूपता । जो लोग वकार के उच्चारण में दोनों ओष्ठों का प्रयोग करके उसे बकार बना देते हैं उन्हें यह वचन ध्यान से पढ़ना चाहिये । [लघु०] जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम् ॥ अर्थः—जिह्वामूलीय का स्थान जिह्वा की जड़ होता है । व्याख्या—जिह्वामूलीयस्य ।६।१। जिह्वामूलम् ।१।१। जिह्वा का मूल स्थान

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