भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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२२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां अर्थात् अनुस्वार और यमों का 'नासिका' स्थान होता है। अब अयोगवाहों में शेष रहे जिह्वामूलीय, उपध्मानीय और विसर्ग। इन में से जिह्वामूलीय का 'जिह्वामूल' ही स्थान निश्चित है, इसी प्रकार उपध्मानीय भी सदैव पकार या फकार के आश्रित होने से ओष्ठस्थानीय ही रहते हैं। तो अब विसर्ग के सिवाय अयोगवाहों में अन्य कोई अनियतस्थान वाला नहीं रहा। उदाहरण यथा—'कविः' यहां इकारा- श्रित होने से विसर्जनीय का तालुस्थान होता है। 'भानुः' यहां उकाराश्रित होने से विसर्जनीय का ओष्ठस्थान है। 'रामयोः' यहां ओकाराश्रित होने से विसर्जनीय का कण्ठ+ओष्ठ स्थान है। इसी प्रकार अन्यत्र भी जिस २ के आश्रित विसर्ग होगा उस २ का वह २ स्थान विसर्ग का भी होगा। [लघु०] इचुयशानां तालु ॥ अर्थ.—अठारह प्रकार के इवर्ण, चवर्ग, दो प्रकार के यकार तथा शकार का 'तालु' स्थान होता है। व्याख्या—इचुयशानाम् ।६।३। तालु ।१।१। समास—इश्च चुश्च यश्च शश्च इचुयशाः, तेषाम् = इचुयशानाम्, इतरेतरद्वन्द्व। यहां लोकप्रसिद्धयनुसार 'इ' से इवर्णकुल, 'चु' से चवर्ग 'य्' से अनुनासिक और अननुनासिक दोनों प्रकार के यकारों का ग्रहण होता है। दांतों के पीछे जो कठिन मुख की छत है उसे 'तालु' कहते हैं। [लघु०] ऋ-टुर-षाणां मूर्धा ॥ अर्थ—अठारह प्रकार के ऋवर्ण, टवर्ग, रेफ तथा षकार का 'मूर्धा' स्थान होता है। व्याख्या—ऋटुरषाणाम् ।६।३। मूर्धा ।१।१। समास—ऋ च टुश्च रश्च षश्च ऋटुरषाः, तेषाम् = ऋटुरषाणाम्, इतरेतरद्वन्द्व। 'तालु' स्थान से पीछे मुख की छत का जो कोमल भाग है उसे 'मूर्धा' कहते हैं। आजकल षकार का उच्चारण सम्यग्- रीत्या नहीं हुआ करता अतः इस का विशेष ध्यान रखना चाहिये। [लघु०] ऌ-तुल-सानां दन्ताः ॥ अर्थ—बारह प्रकार के ऌकार, तवर्ग, दो प्रकार के लकार तथा सकार का 'दन्त' स्थान होता है। व्याख्या—ऌतुलसानाम् ।६।३। दन्ताः ।१।३। समास—ऌ च तुश्च लश्च सश्च = ऌतुलसाः, तेषाम् = ऌतुलसानाम्, इतरेतरद्वन्द्व। यहां 'दन्त' से तात्पर्य ऊपर वाले दांतों के पीछे साथ लगे हुए मांस से है, अतः एवं भग्न दांतों वाला पुरुष भी इन वर्णों का उच्चारण कर सकता है। [लघु०] उपूपध्मानीयानामोष्ठौ ॥ अर्थ—अठारह प्रकार के उकार, पवर्ग तथा उपध्मानीय का ओष्ठ (होठ) स्थान होता है।