भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 633 में से

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संज्ञा-प्रकरणम् २५ थोड़ी दूर रखना चाहिये । स्वरों का 'विवृत' प्रयत्न है; अर्थात् उनके उच्चारण में जिह्वा (उकार के उच्चारण में ओष्ठ) को स्थान से दूर रखना चाहिये । ह्रस्व अवर्ण का 'संवृत' प्रयत्न है; अर्थात् इस के उच्चारण में जिह्वा को स्थान से हटा कर उसके समीप रखना चाहिये । उन सब प्रयत्नों का शिक्षा-ग्रन्थों में यथावत् वर्णन किया गया है वहीं देखें । उन प्रयत्नों से व्याकरण में और तो कोई दोष नहीं आता किन्तु ह्रस्व अकार दीर्घ आकार का सवर्णी नहीं हो सकता; क्योंकि ह्रस्व अकार का संवृत और दीर्घ आकार का विवृत प्रयत्न होता है । सावर्ण्य न होने से 'दण्ड + आनयन' इत्यादि में अकः सवर्णे दीर्घः (४७) द्वारा सवर्णदीर्घ न हो सकेगा । इस दोष की निवृत्ति के लिये महामुनि पाणिनि ने इस शास्त्र में प्रक्रिया-अवस्था में ह्रस्व अकार को विवृत माना है, इस से दोनों की सवर्ण-संज्ञा हो जाने से कोई दोष नहीं आता । इस विषय का विस्तार अ अ (८.४.६७) सूत्र पर 'काशिका' आदि व्याकरण के उच्च ग्रन्थों में देखें । अब बाह्य-यत्न का वर्णन किया जाता है - [लघु०] बाह्ययत्नस्त्वेकादशधा । विवारः संवारः श्वासो नादोऽघोषो घोषोऽल्पप्राणो महाप्राण उदात्तोऽनुदात्तः स्वरितश्चेति । खरो विवाराः श्वासा अघोषाश्च । हशः संवारा नादा घोषाश्च । वर्गाणां प्रथम-तृतीय-पञ्चमा यण- श्चाल्पप्राणाः । वर्गाणां द्वितीय-चतुर्थौ शलश्च महाप्राणाः ॥ अर्थः-बाह्ययत्न ग्यारह प्रकार का होता है । १-विवार, २-संवार, ३-श्वास, ४-नाद, ५-अघोष, ६-घोष, १ ७-अल्पप्राण, ८-महाप्राण, ९-उदात्त, १०-अनुदात्त, ११-स्वरित । 'खर्' प्रत्याहार के अन्तर्गत वर्ण विवार, श्वास तथा अघोष यत्न वाले होते हैं । 'हश्' प्रत्याहार के अन्तर्गत वर्ण संवार, नाद तथा घोष यत्न वाले होते हैं । वर्गों के प्रथम, तृतीय, पञ्चम और यण् अल्पप्राण यत्न वाले होते हैं । वर्गों के द्वितीय, चतुर्थ और शल् महाप्राण यत्न वाले होते हैं । व्याख्या-हशः संवारा नादा घोषाश्च तथा यणश्चाल्पप्राणाः इन दोनों स्थानों पर 'च' से 'अच्' का ग्रहण होता है । अतः अच्-संवार, नाद, घोष तथा अल्पप्राण यत्न वाले हैं । उदात्त, अनुदात्त और स्वरित भी अचों के ही यत्न हैं इन का वर्णन पीछे हो चुका है अतः यहां इन के विषय में कुछ नहीं कहा गया । यद्यपि यह वर्णन ध्वनिशास्त्र का विषय है तथापि यहां विवार आदि का सङ्क्षिप्त सरलार्थ लिख देना अनुचित न होगा । विवार-वर्णोच्चारण के समय मुख के खुलने को विवार कहते हैं । जिन वर्णों १. यहां पर अघोषः, घोषः ऐसा उपर्युक्त पाठ मानने से अन्वय ठीक हो जाता है, फिर एक २ को छोड़ देने से “विवार, श्वास, अघोष" तथा "संवार, नाद, घोष" यह क्रम भी ठीक हो जाता है।

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