भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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२६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां के उच्चारण करते समय मुख खुलता है वे विवार-यत्न वाले कहाते हैं। संवार - वर्णोच्चारण के समय मुख के विकास न होने को संवार कहते हैं। श्वास - वर्णोच्चा- रण के समय श्वास चलने को श्वास यत्न कहते हैं। नाद - वर्णोच्चारण के समय नाद अर्थात् गम्भीर ध्वनि होने को नाद यत्न कहते हैं। घोष-अघोष—वर्णोच्चारण के समय घोष अर्थात् गूंज का उठना घोष तथा गूंज का न उठना अघोष यत्न कहाता है। अल्पप्राण-महाप्राण—वर्णोच्चारण के समय प्राणवायु के अल्प उपयोग को अल्पप्राण तथा अधिक उपयोग को महाप्राण यत्न कहते हैं। अब उपर्युक्त स्थान-यत्न-प्रकरण में आए हुए १ १ स्पर्श २ अन्तस्थ या अन्तस्था, ३ ऊष्म, ४ स्वर, ५ जिह्वामूलीय ६ उपध्मानीय ७ अनुस्वार और ८ विसर्ग इन आठ शब्दों की व्याख्या स्वयं ग्रन्थकार करते हैं— [लघु०] कादयो मावसानाः स्पर्शाः। यणोऽन्तस्थाः। शल ऊष्माणः। अच स्वराः। ≍ क ≍ ख इति कखाभ्यां प्रागर्धविसर्गसदृशो जिह्वामूलीयः। ≍ प ≍ फ इति पफाभ्यां प्रागर्धविसर्गसदृश उपध्मानीयः। 'अं अः' इत्यच परावनुस्वारविसर्गौ॥ अर्थ — 'क्' से ले कर 'म्' पर्यन्त स्पर्श वर्ण हैं। यण् अर्थात् 'य्, व्, र्, ल्' ये चार वर्ण अन्तस्थ वा अन्तस्था२ हैं। शल् अर्थात् 'श्, ष्, स्, ह्' ये चार वर्ण ऊष्म हैं। अच् प्रत्याहार स्वर होता है। 'क्' अथवा 'ख्' वर्ण से पूर्व (तथा अच् से परे) आधे विसर्ग के तुल्य जिह्वामूलीय होता है। 'प्' अथवा 'फ्' वर्ण से पूर्व (तथा अच् से परे) आधे विसर्ग के तुल्य उपध्मानीय होता है। 'अं, अः' यहां अकार स्वर से परे क्रमशः अनुस्वार तथा विसर्ग हैं। व्याख्या—'क्' से 'म्' तक स्पर्श वर्ण हैं। यहां लौकिक क्रम का आश्रयण किया गया है जो आज तक प्रसिद्ध चला आ रहा है। प्रत्याहारसूत्रों में 'क्' से 'म्' तक मिलना असम्भव है अतः कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग और पवर्ग ये पच्चीस वर्ण ही स्पर्शसंज्ञक होते हैं। इन का नाम स्पर्श इस कारण से है क्योंकि इन का उच्चारण जिह्वा (ओष्ठ भी) का स्थान के साथ स्पर्श होने से होता है। 'य्, व्, र्, ल्' इन चार वर्णों को अन्तस्थ या अन्तस्था इसलिये कहते हैं क्योंकि ये स्वर और व्यञ्जनों के बीच के रहते हैं। प्रत्याहारसूत्रों में भी स्वरों और व्यञ्जनों के मध्य इन को पढ़ा गया है। ये व्यञ्जन भी हैं और स्वर भी। अंग्रेजी में इन को अर्धस्वर (Semi Vowel) भी इसीलिये कहा जाता है। इको यणचि (१५), इग्यणः सम्प्रसारणम् १ तत्र स्पृष्टं प्रयत्नं स्पर्शानाम्; ईषत्स्पृष्टम् अन्तस्थानाम्; ईषद्विवृतम् ऊष्मणाम्; ⁕विवृतं स्वराणाम्; जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम्; उपूपध्मानीयानामोष्ठौ; नासि- काऽनुस्वारस्य, अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः। २ अन्तस्थ' शब्द का उच्चारण रामशब्दवत् तथा 'अन्तस्था' शब्द का उच्चारण विश्वपाशब्दवत् होता है।