भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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संज्ञा-प्रकरणम् २७ (२५६) आदि सूत्र भी यही प्रकट करते हैं। कुछ लोगों का विचार है कि प्रसिद्ध- लिपिक्रम में स्पर्शों और ऊष्मों के मध्य में वर्त्तमान होने से इन का नाम अन्तस्थ पड़ गया है। 'श्, ष्, स्, ह्' ये चार वर्ण ऊष्म कहाते हैं। इन को ऊष्म कहने का कदाचित् यह प्रयोजन है कि इन के उच्चारण में गरम वायु निकलती है। कुछ लोगों की राय है कि इन के उच्चारण में शरीर में उष्णता - गरमी का अधिक सञ्चार होता है अतः ये ऊष्म कहाते हैं। 'क्' या 'ख्' परे होने पर विसर्ग के स्थान पर जिह्वामूलीय तथा 'प्' या 'फ्' परे होने पर उपध्मानीय आदेश होते हैं यह आगे कुप्वोः ≍ क ≍ पौ च (६८) सूत्र पर स्पष्ट करेंगे। ये जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय आधे विसर्ग के सदृश होते हैं। यहां सादृश्य उच्चारण की अपेक्षा से नहीं किन्तु लिपि की अपेक्षा से समझना चाहिये। यथा विसर्ग का स्वरूप ' ः ' इन ऊपर नीचे लिखे दो गोल शून्य चिह्नों से प्रकट किया जाता है, इनका आधा ' ≍ ' यही उपध्मानीय और जिह्वा- मूलीय का स्वरूप समझना चाहिये। अनुस्वार की आकृति ' ं ' इस प्रकार ऊपर एक बिन्दुरूप होती है। यह सदा स्वर के ऊपर लिखा जाता है परन्तु इस की स्थिति सदा स्वर के अनन्तर स्वीकार की जाती है। अनुस्वार का चिह्न यथा—अं, इं, उं, कं, किं, कुं इत्यादि। विसर्ग की आकृति ' ः ' इस प्रकार दो गोल चिह्नों से प्रकट की जाती है। यह सदा स्वर के आगे प्रयुक्त किया जाता है। इसकी स्थिति भी स्वर के अनन्तर ही स्वीकार की जाती है। विसर्ग का उदाहरण यथा—अः, इः, उः, कः, किः, कुः इत्यादि। (१) अथ स्थान-बोधक-चक्रम्

कण्ठःतालुओष्ठौमूर्धादन्ताःनासिकाकण्ठतालुकण्ठोष्ठम्दन्तोष्ठम्जिह्वा०
ङ्व्≍क
क्च्प्ट्त्म्≍ख
ख्छ्फ्ठ्थ्ञ्
ग्ज्ब्ड्द्ण्
घ्झ्भ्ढ्ध्न्
ङ्ञ्म्ण्न्
ह्य्≍प्र्ल्
श्≍फ्ष्स्