लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां व्याख्या — सुप्तिङन्तम् १।१। पदम् १।१। समास — सुप च तिङ् च सुप्तिङौ, इतरे- तरद्वन्द्वः । सुप्तिङौ अन्तो यस्य तत्—सुप्तिङन्तम् (शब्दस्वरूपम्), बहुव्रीहि समास । अर्थ — (सुप्तिङन्तम्) सुबन्त और तिङन्त शब्द-स्वरूप (पदम्) पद-सञ्ज्ञक होते हैं । यहां शब्दानुशासन-शास्त्र के प्रस्तुत होने से सुप्तिङन्तम् पद का 'शब्द-स्वरूपम्' विशेष्य अध्याहार कर लिया जाता है । स्वौजसमौट्० (११८) सूत्र से विधान किये गये इक्कीस प्रत्यय 'सुप्' तथा तिप्तस्झिसिप्० (३७५) सूत्र से विधान किये गये अठारह प्रत्यय 'तिङ्' कहाते हैं । ये सुप् वा तिङ् प्रत्यय जिसके अन्त में हों उन की पद-सञ्ज्ञा होती है । यहां यह बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि इन प्रत्ययों से युक्त सम्पूर्ण समुदाय की ही पद सञ्ज्ञा होती है । केवल प्रकृति वा प्रत्यय की नहीं । उदाहरण यथा— ‘रामः पुष्प, देवस्य पुष्पस्य’ इत्यादि सुप् अन्त में होने के कारण ‘पदसञ्ज्ञक’ हैं । पचति, पठति अपचत् अपठत् —इत्यादि तिङ् अन्त में होने के कारण पदसञ्ज्ञक हैं । पदसञ्ज्ञा का प्रयोजन आगे (७७ ८० ६३ १०५ आदि) सूत्रों से स्पष्ट होगा । इस सूत्र में 'अन्त' ग्रहण का प्रयोजन आगे (१५४) सूत्र पर स्पष्ट करेंगे । [लघु०] इति सञ्ज्ञा-प्रकरणं समाप्तम् ॥ अर्थ —यह सञ्ज्ञा प्रकरण समाप्त होता है । व्याख्या —इस प्रकरण में यद्यपि व्याकरण-गत सम्पूर्ण सञ्ज्ञाओं का समावेश नहीं किया गया तथापि सन्धि-प्रकरण के लिये उपयोगी प्रायः सभी सञ्ज्ञाओं का इस में वर्णन आ गया है । 'प्रायः' कथन का यह तात्पर्य है कि अदेङ् गुण (२५), वृद्धिरादैच् (३२), अचोऽन्त्यादि टि (३६), तस्य परमाम्रेडितम् (६६) प्रभृति सूत्रों से गुण, वृद्धि, टि और आम्रेडित आदि अन्य भी सन्ध्युपयोगी सञ्ज्ञाएं आगे कही गई हैं । अभ्यास (१) (१) 'क्, श्, ए, व्, ऌ, म्, ख्, ह्, अ, र्, औ, ऋ' इन वर्णों के स्थान तथा दोनों प्रकार के यत्न लिख कर यथासम्भव सवर्णों का भी निर्देश करें । (२) 'अण्, टव्, रल्, जश्, यण्, छव्, मय्, झय्, रँ' इन प्रत्याहारों की प्रसून सिद्धि कर तदन्तर्गत वर्णों का संक्षिप्तरीत्या उल्लेख करें । (३) अचों में परस्पर कितने प्रकार का अन्तर सम्भव है, उदाहरण द्वारा स्पष्ट करें । (४) कौन सूत्र 'ऋ' सञ्ज्ञा करता है ? इस के कितने और कौन से सञ्ज्ञी होते हैं ? (५) अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्यय सूत्र में 'अप्रत्यय' पद का क्या अभिप्राय है और इस का किस के साथ सम्बन्ध है ? सोदाहरण स्पष्ट करें । (६) सञ्ज्ञा और सञ्ज्ञी स्पष्ट करते हुए अदर्शनं लोप सूत्र के 'अदर्शनम्' पद का विवेचन करें ।