लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ पौर्णमासी = पूर्णिमा | मैत्री* = मित्रता | वैतरणी = नरक की नदी प्रणाली = तरीक़ा | मौर्वी* = धनुष-डोरी | वैदेही = सीता प्रतीची = पश्चिमदिशा | यक्षी* = कुवेर-स्त्री | वैयासिकी = व्यास-रचना प्रतोली = गली | यवनानी = यवनलिपि | व्याघ्री* = बाघिन प्रसाधनी = कङ्घी | याज्ञसेनी = द्रौपदी | शतघ्नी = तोप प्राची = पूर्वदिशा | यामिनी = रात्रि | शमी = शमी वृक्ष बदरी* = बेर का वृक्ष | युवती = जवान स्त्री | शर्वरी* = रात्रि बिसिनी = कमल का पौधा | रजनी = रात | शाटी = वस्त्र, साड़ी भट्टिनी = महारानी | राक्षसी = राक्षस स्त्री | शुण्ठी = सोंठ भवती = आप (स्त्री) | राजधानी = राजधानी | शुनी = कुतिया भवानी = दुर्गा | राज्ञी = रानी | शैली = रीति भागीरथी = गङ्गा | रुक्मिणी = कृष्ण पत्नी | श्रेणी = पङ्क्ति भामिनी = कोपशीला | रुद्राणी = पार्वती | सखी = सहेली भारती = संस्कृतभाषा | रेवती = बलराम पत्नी | सङ्ग्रहणी = एक रोग भेरी* = बड़ा नगारा | रोहिणी = एक नक्षत्र | सपत्नी = सौकन मञ्जरी* = कोंपल | लेखनी = कलम | सरस्वती = वाग्देवी मन्त्रिणी = मन्त्री (स्त्री) | लेखिनी = कलम | सरोजिनी = कमल-समूह मन्दाकिनी = स्वर्गङ्गा | वह्नियिनी = सेना | साध्वी = पतिव्रता मर्कटी = बानरी | वसुमती = पृथ्वी | सिंहवाहिनी = दुर्गा मषी = स्याही | वंशी = बांसुरी | सिंही = शेरनी महती = बड़ी | वाणी = वाणी | सीमन्तिनी = स्त्री महामारी* = प्लेग आदि | वापी = बावड़ी | सुन्दरी* = रूपवती महिषी* = भैंस, पटरानी | वामी = घोटी | सूची = सूई मही = पृथिवी | वायसी = कौवी | सूरी* = कुन्ती मातामही = नानी | वाराणसी = बनारस | सैरन्ध्री* = दासी मातुलानी = मामी | वारुणी = मद्य, पश्चिम | सौदामनी = विद्युत् मातुली = मामी | वाहिनी = सेना, नदी | स्थली¹ = सुन्दर स्थल मालती = चमेली (लता) | विदुषी* = पठित स्त्री | स्रोतस्वती = नदी मुम्बापुरी* = बम्बई नगर | विभावरी* = रात्रि | हरिणी = हरनी मुरली = बांसुरी | विष्णुपदी = गङ्गा | हरीतकी = हरड़ मृडानी = पार्वती | वीथी = रास्ता, गली | हसन्ती = अगीठी मेदिनी = पृथिवी | वैजयन्ती = पताका | हिमानी = वरफ-समूह | | ह्लादिनी = वज्र, विद्युत् १ स्थलशब्द से जानपद-कुण्ड-गोण स्थल० (४।१।४२) सूत्रद्वारा ङीप् प्रत्यय कर नित्य- स्त्रीलिङ्गी 'स्थली' शब्द निष्पन्न होता है। इस का अर्थ है—अकृत्रिम या स्वा-