भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 350

अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३३५ हे वारि + स् । यहां स्वमोर्नपुंसकात् (२२४) से सुं का लुक् हो कर 'हे वारि !' हुआ। अब यहां प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् (१६०) से सम्बुद्धि को निमित्त मान कर ह्रस्वस्य गुणः (१६६) से गुण प्राप्त होता है। परन्तु न लुमताङ्गस्य (१६१) के निषेध के कारण प्रत्ययलक्षण नहीं हो सकता। हमें यहां पाक्षिक गुण करना अभीष्ट है। अतः न लुमताङ्गस्य (१६१) निषेध की अनित्यता सिद्ध करते हैं— [लघु०] न लुमता० (१६१) इत्यस्याऽनित्यत्वात् पक्षे सम्बुद्धिनिमित्तो गुणः —हे वारे !, हे वारि !। आङो ना० (१७१)—वारिणा। घेर्डिति (१७२) इति गुणे प्राप्ते— अर्थः—न लुमताङ्गस्य (१६१) यह निषेध अनित्य है। अतः पक्ष में ह्रस्वस्य गुणः (१६६) से सम्बुद्धिनिमित्तक गुण भी हो जाता है। गुणपक्ष में—हे वारे ! और गुणाभाव में—हे वारि ! । व्याख्या—न लुमताङ्गस्य (१६१) सूत्र अनित्य है। इस में ज्ञापक इकोऽचि विभक्तौ (२४५) सूत्र में 'अचि' पद का ग्रहण है। हम इसे समझाने के लिये पक्षात्मक ढंग से विचार करते हैं। तथाहि— पूर्वपक्षी—इकोऽचि विभक्तौ सूत्र में 'अचि' पद के ग्रहण का क्या प्रयोजन है ? उत्तरपक्षी—'वारि + भ्याम्' इत्यादि रूपों में भ्याम् आदि हलादि विभक्तियों में नुँम् न हो जाये, इसलिये सूत्र में 'अचि' पद का ग्रहण किया गया है। पूर्वपक्षी—'वारिभ्याम्' आदि में यदि नुँम् हो भी जाये तो न लोपः० (१८०) द्वारा लोप हो जाने से कोई दोष नहीं आता। अतः 'अचि' पद का ग्रहण व्यर्थ है। उत्तरपक्षी—तो 'हे वारि!' यहां लुक् हुए सम्बुद्धि को निमित्त मान कर नुँम् न हो जाये, इसलिये 'अचि' पद का ग्रहण किया है। पूर्वपक्षी—सम्बुद्धि में भी न लोपः० (१८०) से नकार का लोप हो जायेगा। उत्तरपक्षी—ऐसा नहीं हो सकता; क्योंकि सम्बुद्धि में न ङिसम्बुद्ध्योः (२८१) सूत्र नकार का लोप नहीं करने देगा। अतः 'हे वारिन्!' आदि अनिष्ट प्रयोगों की निवृत्ति के लिये 'अचि' पद का ग्रहण करना आवश्यक है। पूर्वपक्षी—ओहो! सम्बुद्धि में तो नुँम् प्राप्त ही नहीं हो सकता; क्योंकि विभक्ति का लुक् होने से न लुमताङ्गस्य (१६१) से प्रत्ययलक्षण का निषेध हो जाता है। अतः 'अचि' पद का ग्रहण व्यर्थ है। उत्तरपक्षी—आप का कथन सत्य है। इस प्रकार 'अचि' पद के बिना भी 'झलचः' कथन में अच्प्रत्याहार का ग्रहण भी यही प्रमाणित करता है कि यहां नपुंसकस्य झलचः द्वारा ही नुँम् होना चाहिये। हमारे विचार में दोनों सूत्रों से एक ही कार्य प्राप्त है अतः विरोध या विप्रतिषेध कुछ भी नहीं, इस तरह इन के बलावल का विचार निष्प्रयोजन ही है।