लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३३७ से प्राप्त औत्व, तृज्वत्क्रोष्टुः (७.१.५५) और विभाषा तृतीयादिष्वचि (७.१.५७) से प्राप्त तृज्वद्भाव तथा घेर्डिति (७.३.१११) से प्राप्त गुण यद्यपि नुँम् (७.१.७३) से परे हैं और विप्रतिषेधे परं कार्यम् (११३) के अनुसार इन की ही प्रवृत्ति उचित है; तथापि नुँम् की प्रवृत्ति पूर्वविप्रतिषेध से हो जाती है। अर्थात् इन के साथ नुँम् का विप्रतिषेध होने पर विप्रतिषेधे परं कार्यम् (११३) का दूसरा अर्थ—'अपरं कार्यम्' मान कर नुँम् की प्रवृत्ति हो जाती है।¹ 'वारि+ए' यहां पूर्वविप्रतिषेध के कारण गुण का बाध कर इकोऽचि विभक्तौ (२४५) से नुँम् हो कर नकार को णकार करने से 'वारिणे' प्रयोग सिद्ध होता है। 'वारि+अस्' (ङसिँ वा ङस्) यहां भी घेर्डिति (१७२) से प्राप्त गुण का पूर्व- विप्रतिषेध के कारण नुँम् बाध कर लेता है—'वारिणः'। 'वारि+ओस्' यहां परत्व के कारण इको यणचि (१५) का बाध कर नुँम् प्रवृत्त हो जाता है—'वारिणोः'। षष्ठी के बहुवचन 'वारि+आम्' में ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) से आम् को नुट् का और इकोऽचि विभक्तौ (२४५) से अङ्ग को नुँम् का आगम युगपत् प्राप्त हुआ। नुम्चिर० (वा० १६) के द्वारा पूर्वविप्रतिषेध से नुट् हो गया। तब नामि (१८४) से दीर्घ और नकार को णकार करने पर 'वारीणाम्' प्रयोग सिद्ध हुआ। नोट—यदि नुँम् हो जाता तो वह 'वारि' का ही अवयव होता, आम् का नहीं। तब 'नाम्' परे न रहने से नामि (१८४) द्वारा दीर्घ न हो सकता। किञ्च तब अङ्ग के अजन्त न होकर नान्त हो जाने से 'वारिणाम्' ऐसा अनिष्ट प्रयोग बन जाता। सप्तमी के एकवचन 'वारि+इ' (ङि) में अच्च घेः (१७४) से ङि को औत्व और इकोऽचि विभक्तौ (२४५) से अङ्ग को नुँम् प्राप्त होने पर वृद्धौत्व० (वा० २४) से पूर्वविप्रतिषेध के कारण नुँम् हो जाता है। तब नकार को णकार होकर—'वारिणि' प्रयोग सिद्ध होता है। वारिशब्द की रूपमाला यथा— १. इन के उदाहरण भाष्य (७.१.६६) में अतीव सरल उपाय से समझाये गये हैं। तद्यथा— गुणवृद्ध्यौत्वतृज्वद्भावेभ्यो नुम् पूर्वविप्रतिषिद्धम्। तत्र गुणस्यावकाशः— अग्नये, वायवे। नुमोऽवकाशः—त्रपुणी, जतुनी। इहोभयं प्राप्नोति—त्रपुणे, जतुने। वृद्धेरवकाशः—सखायौ, सखायः। नुमः स एव। इहोभयं प्राप्नोति—अतिसखीनि, ब्राह्मणकुलानि। औत्वस्यावकाशः—अग्नौ, वायौ। नुमः स एव। इहोभयं प्राप्नोति —त्रपुणि, जतुनि। तृज्वद्भावस्यावकाशः—क्रोष्ट्रा, क्रोष्टुना। नुमः स एव। इहोभयं प्राप्नोति—कुशक्रोष्टुनेऽरण्याय, हितक्रोष्टुने वृषलकुलाय। नुम् भवति पूर्वविप्रतिषेधेन। ल० प्र० (२२)