लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 362, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३४७ अकार और इकार तथा उकार प्राप्त होते हैं। अब इस सूत्र के नियम से इकार और उकार ही ह्रस्व होंगे अवर्ण नहीं। 'प्रद्यो' यहां ओकार को उकार ह्रस्व होकर 'प्रद्यु' हुआ। अब इस की समग्र प्रक्रिया तथा रूपमाला मधुशब्दवत् होती है— प्र० प्रद्यु प्रद्युनी प्रद्यूनि । प० प्रद्युनः प्रद्युभ्याम् प्रद्युभ्यः द्वि० ,, ,, ,, । ष० ,, प्रद्युनोः प्रद्यूनाम् तृ० प्रद्युना प्रद्युभ्याम् प्रद्युभिः । स० प्रद्युनि ,, प्रद्युषु च० प्रद्युने ,, प्रद्युभ्यः । सं० हे प्रद्यो!,प्रद्यु! हे प्रद्युनी! हे प्रद्यूनि! यहां पर धातुवृत्तिकार श्रीमाधव लिखते हैं कि तृतीयादि विभक्तियों में पुंव- द्भाव नहीं होता। क्योंकि नपुंसक में—प्रद्यु और पुंलिङ्ग में—प्रद्यो शब्द होने से दोनों इगन्त नहीं रहते। इगन्त शब्दों की ही तृतीयादिषु भाषित० (२४६) सूत्र में भाषित पुंस्कता कही गई है। परन्तु अन्य कई लोग इसे स्वीकार नहीं करते, वे कहते हैं कि पुंलिङ्गगत 'प्रद्यो' शब्द ही नपुंसक में 'प्रद्यु' शब्द बना है अतः एकदेशविकृतन्याय से दोनों एक ही हैं। नपुंसकगत इगन्त प्रद्यु शब्द पुंलिङ्ग में भी वर्त्तमान होने से पुंवद्भाव को प्राप्त हो जायेगा। ऐसा मानने वालों के मत में—प्रद्यवा, प्रद्युना (टा); प्रद्यवे, प्रद्युने(ङे); प्रद्योः, प्रद्युनः(ङसिं वा ङस्); प्रद्यवोः, प्रद्युनोः(ओस्); प्रद्यवाम्, प्रद्यूनाम् (आम्); प्रद्यवि, प्रद्युनि(ङि)—इस प्रकार दो २ रूप बनेंगे। (यहां ओकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) ---------:०:--------- अब ऐकारान्त 'प्ररै' शब्द का वर्णन करते हैं— [लघु०] प्ररि। प्ररिणी। प्ररीणि॑। एकदेशविकृतमनन्यवत्—प्रराभ्याम्। प्ररीणाम्॥ व्याख्या—प्रकृष्टो राः = धनं यस्य तत् = प्ररि(कुलम्)। जिसका विपुल धन हो उसे 'प्ररै' कहते हैं। नपुंसक में एच इग्घ्रस्वादेशे (२५०) की सहायता से ह्रस्वो नपुंसके० (२४३) द्वारा ह्रस्व—इकार हो कर 'प्ररि' शब्द बन जाता है। अब इस का उच्चारण प्रायः 'वारि'शब्दवत् होता है। रूपमाला यथा— प्र० प्ररि प्ररिणी प्ररीणि । प० प्ररिणः प्रराभ्याम् प्रराभ्यः द्वि० ,, ,, ,, । ष० ,, प्ररिणोः प्ररीणाम् तृ० प्ररिणा प्रराभ्याम् प्रराभिः । स० प्ररिणि ,, प्ररासु च० प्ररिणे ,, प्रराभ्यः । सं० हे प्ररि!,प्ररे! हे प्ररिणी! हे प्ररीणि! (१) नोट—भ्याम्, भिस्, भ्यस् और सुप् में एकदेशविकृतमनन्यवत् की सहा- यता से पुनः वही रै शब्द माना जाने से रायो हलि (२१५) द्वारा ऐकार को आकार होकर 'प्रराभ्याम्' आदि रूप सिद्ध होते हैं। (२) नोट—यहां भी पूर्वोक्त 'प्रद्यो' शब्द की तरह श्रीमाधव के मत में