भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 364

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३४६ (५) एच इग्घ्रस्वादेशे सूत्र की व्याख्या करते हुए इस की आवश्यकता पर एक विस्तृत नोट लिखें । (६) निम्नलिखित सूत्र-वार्त्तिकों की विस्तृत व्याख्या करें— १. तृतीयादिषु० । २. अल्लोपोऽनः । ३. अस्थिदधि० । ४. विभाषा ङिश्श्योः । ५. स्वमोर्नपुंसकात् । ६. वृद्धैचौत्व-तृज्वद्भाव-गुणेभ्यो० । (७) सूत्रनिर्देशपूर्वक सिद्धि करें— १. अक्ष्णा । २. प्रराभ्याम् । ३. वारिणे । ४. हे धातः ! । ५. सुल्वा । ६. त्रीणि । ७. दधनि । ८. द्वे । ६. धातॄणि । १०. मधूनाम् । (८) सख्यि, सुनी, पीलु, प्रद्यो, वारि, सुधी—शब्दों का उच्चारण लिखें । ---::०::--- इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु-सिद्धान्त- कौमुद्यामजन्त-नपुंसक-लिङ्ग- प्रकरणं समाप्तम् ॥ अथ हलन्त-पुँल्लिङ्ग-प्रकरणम् अब क्रमप्राप्त हलन्तपुंलिङ्ग शब्दों का विवेचन करते हैं। हयवरट् (प्रत्या- हार-सूत्र ५) के क्रमानुसार सर्वप्रथम हकारान्त शब्दों का नम्बर आता है । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२५१) हो ढः ।८।२।३१॥ हस्य ढः स्याज्झलि पदान्ते च । लिट्, लिड् । लिहौ । लिहः । लिड्भ्याम् । लिट्त्सु, लिड्सु ॥ अर्थः—झल् परे होने पर या पदान्त में हकार के स्थान पर ढकार हो । व्याख्या—झलि ।७।१। (झलो झलि से)। पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । अन्ते ।७।१। (स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से) । हः ।६।१। ढः ।१।१। अर्थः—(झलि) झल् परे होने पर या (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में (हः) ह के स्थान पर (ढः) ढ् हो जाता है । सूत्र में ढकारोत्तर अकार उच्चारणार्थ है । लेढीति लिट् । चाटने वाले को 'लिह्' कहते हैं। लिहँ आस्वादने (अदा० उभ०) धातु से कर्त्ता में क्विँप् च (८०२) सूत्र द्वारा क्विँप् प्रत्यय हो उस का सर्वापहार लोप¹ करने से 'लिह्' शब्द सिद्ध होता है। लिहू के कृदन्त होने से कृत्तद्धित० (११७) सूत्र से प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर सुँ आदि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं। १. जो लोप सम्पूर्ण प्रत्यय का अदर्शन करता है उसे 'सर्वापहार' या 'सर्वापहारी' लोप कहते हैं। क्विन्, क्विँप्, विँट्, विँच् आदि प्रत्ययों का सर्वापहार लोप होता है ।