लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३५७ उपस्थित नहीं होती; क्योंकि सर्वत्र सम्प्रसारण विद्यमान रहने से अन्य कार्य अबाध हो जाते हैं। परन्तु विधिस्थलों में महान् झगड़ा उपस्थित हो जाता है; क्योंकि सदैव यह नियम होता है कि प्रथम सञ्ज्ञी वर्त्तमान रहता है और बाद में उस की सञ्ज्ञा की जाती है। इस नियमानुसार पहले यणस्थानिक इक् वर्त्तमान होना चाहिये और पीछे सम्प्रसारणसञ्ज्ञा का विधान करना चाहिये। इस प्रकार वाह ऊठ् (२५७) द्वारा वाह् में तब सम्प्रसारण होगा जब यणस्थानिक इक् होगा। परन्तु यणस्थानिक इक् तब हो सकता है जब कि वाह ऊठ् (२५७) सूत्र प्रवृत्त हो कर सम्प्रसारण कर दे। इस प्रकार यहां अन्योऽन्याश्रय दोष आ कर महान् झगड़ा उपस्थित हो जाता है। क्योंकि अन्योऽन्याश्रय कार्य हो नहीं सकते। जब पहला हो तब उस का आश्रित दूसरा हो और जब दूसरा हो तब उस का आश्रित पहला हो। इस दशा में कोई भी नहीं हो सकता। भाष्यकार ने भी कहा है — इतरेतराश्रयाणि च कार्याणि न प्रकल्पन्ते । इस झगड़े को उपस्थित देख भाष्यकार सूत्रशाटकन्याय के आश्रय से इस का समाधान करते हैं। उन का कथन है कि जैसे कोई पुरुष सूत ले कर जुलाहे के पास जा कर कहता है कि अस्य सूत्रस्य शाटकं वय इस सूत का वस्त्र बुन। अब यहां 'वस्त्र बुन' पर यह सन्देह होता है कि यदि यह वस्त्र है तो बुनना कैसे ? क्योंकि वस्त्र बुना नहीं जा सकता। और यदि यह बुनने योग्य है तो वस्त्र कैसा ? क्योंकि बुनना वस्त्र में सम्भव नहीं हो सकता। इस प्रकार विरोध आने पर लोक में भावी सञ्ज्ञा का आश्रय किया जाता है। अर्थात् उस पुरुष का यह आशय समझा जाता है कि 'इस को ऐसा बुन जिस से यह वस्त्र हो जाये।' इसी प्रकार यहां विधिप्रदेशों में भी भावी सञ्ज्ञा का आश्रयण करना चाहिये। यथा—वाह ऊठ् (२५७) भसञ्ज्ञक वाह् के स्थान पर ऐसा करो कि जिस से किया हुआ कार्य सम्प्रसारणसञ्ज्ञक हो जाये। तो इस प्रकार विधिप्रदेशों में दोष का परिहार हो जाता है। अब इस प्रकरण में सम्प्रसारणसञ्ज्ञा का उपयोग दिखाते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम् —(२५७) वाह ऊठ् ।६।४।१३२॥ भस्य वाहः सम्प्रसारणम् ऊठ् ॥ अर्थः—भसञ्ज्ञक 'वाह्' के स्थान पर सम्प्रसारण ऊठ् हो । व्याख्या—भस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। वाहः ।६।१। सम्प्रसारणम् ।१।१। (वसोः सम्प्रसारणम् से) । ऊठ् ।१।१। अर्थः—(भस्य) भसञ्ज्ञक (वाहः) वाह् के स्थान पर (सम्प्रसारणम्) सम्प्रसारण (ऊठ्) ऊठ् हो। पूर्वसूत्रानुसार वाह् के वकार को ही ऊठ् होगा। विश्ववाह् + अस् (शस्)। यहां यचि भम् (१६५) से वाह् की भसञ्ज्ञा है; अतः प्रकृतसूत्र से इस के वकार को ऊठ् हो जाता है। ऊठ् के ठकार की हलन्त्यम् (१) से इत्सञ्ज्ञा और तस्य लोपः (३) से लोप हो कर 'विश्व ऊ आह् + अस्' हुआ। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—