भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 381

३६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां [लघु०] चत्वारः । चतुरः । चतुर्भिः । चतुर्भ्यः २ ॥ व्याख्या—अब रेफान्त पुंल्लिङ्ग 'चतुर्' (चार, सङ्ख्येयवाची) शब्द का वर्णन करते हैं। चतेरुरन् (उणा० ७३६) सूत्र से चतुर् शब्द की निष्पत्ति होती है। 'चतुर्' शब्द नित्यबहुवचनान्त होता है। 'चतुर् + अस्' (जस्) यहां 'जस्' यह सर्वनामस्थान परे है, अतः चतुरनडुहो- रामुदात्तः (२५६) सूत्र से आम् का आगम हो कर इको यणचि (१४) से यण् तथा सकार को रुत्व-विसर्ग करने पर 'चत्वारः' प्रयोग सिद्ध होता है। चतुर् + शस् (शस्) = चतुरः । सर्वनामस्थान न होने से आम् न होगा। चतुर् + भिस् – चतुर्भिः । चतुर् + भ्यस् = चतुर्भ्यः । चतुर् + आम्। यहां ह्रस्वादि के न होने से ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) द्वारा नुट् प्राप्त नहीं हो सकता, अतः इस की सिद्धि के लिये अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२६६) षट्चतुर्भ्यश्च ।७।१।५५॥ एभ्य आमो नुडागमः ॥ अर्थ —षट्सञ्ज्ञको तथा चतुर् शब्द से परे आम् को नुट् का आगम हो। व्याख्या —षट्चतुर्भ्यः ।५।३। च इत्यव्ययपदम्। आम् ।६।१। (आमि सर्व- नाम्नः सुट् से । यहां उभयनिर्देशे पञ्चमीनिर्देशो बलीयान् द्वारा षष्ठ्यन्ततया विपरि- णाम हो जाता है)। नुट् ।१।१। (ह्रस्वनद्यापो नुट् से)। अर्थ —(षट्चतुर्भ्यः) षट्- सञ्ज्ञकों से तथा चतुर् शब्द से परे (च) भी (आम् ) आम् का अवयव (नुट्) नुट् हो जाता है। नुट् टित् है अतः आम् का आद्यवयव होगा। इसी प्रकरण में आगे (२६७) सूत्र से षट्सञ्ज्ञा की जायेगी, यहां उसी का ग्रहण है। चतुर् शब्द की षट्सञ्ज्ञा नहीं होती अतः इस का पृथक् ग्रहण किया है। चतुर् + आम् । यहां प्रकृत-सूत्र से नुट् का आगम हो कर 'चतुर् + नाम्' हुआ। अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि सूत्रम्—(२६७) रषाभ्यां नो णः समानपदे ।८।४।१॥ (एकपदस्थाभ्यां रेफषकाराभ्यां परस्य नस्य णः स्यात्) । अचो रहा- भ्यां द्वे (६०) – चतुर्ण्णाम्, चतुर्णाम् ॥ अर्थ —एक पद में स्थित रेफ वा षकार से परे नकार को णकार आदेश हो। व्याख्या—रषाभ्याम् ।५।२। नः ।६।१। णः ।१।१। समानपदे ।७।१। समान- ञ्चात् पदम् = समानं पदम् । कर्मधारयसमास । रश्च षश्च = रषौ, ताभ्याम् = रषा- भ्याम् । अपेक्षा नित्य होता रेफादकारः षकाराच्चाकारश्चोच्चारणार्थः । 'ण' इत्यत्राप्य- (परि०) । यहां कार उच्चारणार्थः । रेफ वा धेय । अर्थ—(समानपदे) एक पद में (रषाभ्याम्) रेफ वा षकारादेश हो सन् स्थान पर (ण ) ण् आदेश हो । [र् + न = र्ण, ष् + न = ष्ण] पर हल् न होने से पूर्वोक्त नहीं हो सकता का ही ग्रहण होता है। अतः 'अग्नि- अनित्य से नित्य ही बलवान् होता है। [arrow] न' में णकारादेश न होगा।