लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां परिव्राज् (सन्न्यासी) । इस की सिद्धि के लिये उणादिसूत्र उद्धृत करते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—परौ व्रजेः षः पदान्ते (उणादि० २।१८) । परावुपपदे व्रजेः क्विब्व् स्याद् दीर्घश्च पदान्ते षत्वमपि। परिव्राट्, परिव्राड्। परिव्राजौ ॥ अर्थ —'परि' उपपद होने पर 'व्रज्' (भ्वा० प०) धातु से क्विब्व् प्रत्यय हो और धातु के अकार को दीर्घ हो। किञ्च—पदान्त में षत्व भी होना चाहिये। व्याख्या —यह शाकटायनमुनिप्रणीत उणादिसूत्र (२।१८) है। परौ ।७।१। व्रजेः ।५।१। क्विव्व् ।१।१। (क्विव्व् वचिप्रच्छ्यायस्तू० से) । पदान्ते ।७।१। षः ।१।१। अर्थ —(परौ) 'परि' उपपद होने पर (व्रजेः) व्रज् धातु से (क्विव्व्) क्विब्व् प्रत्यय तथा (दीर्घः) दीर्घ होता है। किञ्च (पदान्ते) पदान्त में (षः) षकार भी हो जाता है। जिस पद के साथ रहने पर कोई कार्य विधान किया जाता है उसे 'उपपद' कहते हैं, उपपद सदा पूर्व में ही प्रयुक्त हुआ करता है। [देखें—तत्रोपपदं सप्तमीस्थम् (६५३), उपपदमतिङ् (६५४)]। यहां 'परि' उपपद होने पर 'व्रज्' धातु से क्विब्व् का विधान है। इस का तात्पर्य यह हुआ कि परिपूर्वक व्रज् धातु से क्विब्व् हो अन्यथा नहीं। क्विब्व् के साथ धातु को दीर्घ करने का भी विधान है। ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत अचों के ही धर्म हैं अतः बिना कहे भी ये अचों के स्थान पर समझने चाहियें। अतः यहां 'व्रज्' धातु के अन्तर्गत रेफोत्तर अकार को ही दीर्घ होगा। पदान्त में विहित षत्व अलोऽन्त्यविधि से जकार के स्थान पर होगा। परि+व्रज्+क्विब्व् = परिव्राज्+क्विब्व्। क्विब्व् का सर्वापहार लोप करने से — परिव्राज्। कृदन्त होने से प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर स्वादियो की उत्पत्ति होती है। परिव्राज्+स् (सुं) यहां हल्ङ्याब्भ्यो० (१७६) से सकार का लोप कर पदान्त में षत्व करने पर—परिव्राष्। झलां जशोऽन्ते (६७) से जश्त्व—डकार तथा वाऽवसाने (१४६) से वैकल्पिक चर्त्व-टकार करने से 'परिव्राट्, परिव्राड्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। रूपमाला यथा— प्र० परिव्राट्-ड्, परिव्राजौ, परिव्राजः। द्वि० परिव्राजम्, परिव्राजौ, परिव्राजः। तृ० परिव्राजा, परिव्राड्भ्याम्, परिव्राड्भिः। च० परिव्राजे, परिव्राड्भ्याम्, परिव्राड्भ्यः। प० परिव्राजः, परिव्राड्भ्याम्, परिव्राड्भ्यः। ष० परिव्राजः, परिव्राजोः, परिव्राजाम्। स० परिव्राजि, परिव्राजोः, परिव्राट्सु-ट्सु। सं० हे परिव्राट्-ड् !, हे परिव्राजौ !, हे परिव्राजः ! । पदान्त में सर्वत्र परौ व्रजेः षः पदान्ते द्वारा षत्व तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से जश्त्व हो जाता है। विश्वराज् (विश्वपति, भगवान्) । विश्वस्मिन् राजत इति विश्वाराट्।