भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 431

४१६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां अर्थ—पदान्त में या झल् परे होने पर संयोग के आदि वाले सकार ककार का लोप हो जाता है। व्याख्या—स्कोः ।६।२। संयोगाद्योः ।६।२। लोपः ।१।१। (संयोगान्तस्य लोपः से)। झलि ।७।१। (झलो झलि से)। पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। अन्ते ।७।१। च इत्यव्ययपदम्। समास—स् च् क् च=स्कौ, तयोः =स्कोः। इतरेतरद्वन्द्वः। संयो- गस्य आदी =संयोगादी तयोः =संयोगाद्योः। षष्ठीतत्पुरुषः। अर्थः--(झलि) झल् परे होने पर या (पदस्य) पद के (अन्ते) पदान्त में स्थित (संयोगाद्योः) जो संयोग, उस के आदि सकार ककार का (लोपः) लोप हो जाता है। यद्यपि यह सूत्र संयोगान्तस्य लोपः (२०) की दृष्टि में असिद्ध है तथापि वचनसामर्थ्य से यह उस का अपवाद है—अपवादो वचनप्रामाण्यात्। 'भ्रस्ज्' यहां पदान्त में प्रकृतसूत्र से संयोग के आदि सकार का लोप हो— 'भृज्'। व्रश्च-भ्रस्ज० (३०७) सूत्र से जकार को षकार, जश्त्व से षकार को डकार तथा वैकल्पिक चर्त्व में टकार करने पर—'भृट्, भृड्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। 'भ्रस्ज्+औ' यहां पदान्त वा झल् परे न होने से संयोगादि सकार का लोप नहीं होता। झलां जश्झशि (१६) और स्तोः श्चुना श्चुः (६२) दोनों प्राप्त हैं। जश्त्व के असिद्ध होने से प्रथम श्चुत्व से सकार को शकार हो—भृश्ज्+औ। पुनः झलां जश्झशि (१६) से तालुस्थानिक शकार के स्थान पर तादृश जश्—जकार करने पर 'भृज्जौ' प्रयोग सिद्ध होता है। रूपमाला यथा— प्र० भृट्-ड् भृज्जौ भृज्जः प० भृज्जः भृड्भ्याम् भृड्भ्यः द्वि० भृज्जम् ,, ,, ष० ,, भृज्ज्योः भृज्जाम् तृ० भृज्जा भृड्भ्याम् भृड्भिः स० भृज्जि ,, भृट्त्सु-ड्त्सु च० भृज्जे ,, भृड्भ्यः सं० हे भृट्-ड् ! हे भृज्जौ ! हे भृज्ज ! अभ्यास (४१) (१) 'ऋत्विक्' आदि में चोः कुः अथवा क्विन्प्रत्ययस्य कुः किसी एक के द्वारा कार्य्य सिद्ध हो सकता है, पुनः दो सूत्रों का निर्माण क्यों ? (२) युञ्जौ, युञ्जः—आदि में चोः कुः द्वारा कुत्व क्यों नहीं होता ? (३) क्विन् का सर्वापहार लोप कैसे और क्यों किया जाता है ? ससूत्र लिखें। (४) युजेरसमासे में 'युजि' के साथ इकार जोड़ने का क्या अभिप्राय है ? (५) निम्नलिखित सूत्रों की सोदाहरण विस्तृत व्याख्या करें— स्कोः ०, ऋत्विग्दधृक्०, क्विन्प्रत्ययस्य कुः, युजेरसमासे। (६) १ स्रग्भ्यां २ परिव्राट्, ३. विश्वराट्, ४. भृट्, ५ भृज्जौ, ६ यु- ङ्भ्याम्, ७ विदवत्सृट्, ८ देवेड्भ्याम्, ६ ऋत्विक्षु—इन प्रयोगों की ससूत्र सिद्धि लिखें। (७) जब संयोगान्तलोप की दृष्टि में स्कोः संयोगाद्योरन्ते च सूत्र असिद्ध है, तो पुनः वह उस का कैसे बाध कर लेता है ?