लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 454, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-पुल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४३६ प्र० सुपात्-द् सुपादौ सुपादः प० सुपदः† सुपाद्भ्याम् सुपाद्भ्यः द्वि० सुपादम् ,, सुपदः† ष० ,, † सुपदोः† सुपदाम्‡ तृ० सुपदा† सुपाद्भ्याम् सुपाद्भिः स० सुपदि† ,, † सुपात्सु‡ च० सुपदे† ,, सुपाद्भ्यः सं० हे सुपात्-द् ! सुपादौ ! सुपादः! †सर्वत्र पादः पत् (३३१) से पाद् को पद् आदेश होता है । ‡पद् आदेश हो कर खरि च (७४) से चर्व्व—तकार हो जाता है । इसी प्रकार— द्विपाद्, त्रिपाद् प्रभृति शब्दों के रूप बनते हैं । अभ्यास (४२) (१) शेषे लोपः सूत्र के दोनों अर्थ स्पष्ट करें । (२) 'युष्मद्, अस्मद्' शब्द अवर्णान्त नहीं अतः सुँट् आगम स्वतः ही प्राप्त नहीं तो पुनः साम आकम् में ससुँट् निर्देश का क्या प्रयोजन है ? (३) किस किस विभक्ति में शेषे लोपः सूत्र की प्रवृत्ति होती है ? (४) शसो न द्वारा नकारादेश कैसे और किस के स्थान पर होता है ? (५) 'युष्मभ्यम्, अस्मभ्यम्' में योऽचि द्वारा यकारादेश क्यों नहीं होता ? (६) 'वाम्, नौ' आदेशों के कौन २ अपवाद हैं ससूत्र सोदाहरण लिखें । (७) द्वेप्रथमयोरम् के अर्थ में 'द्वितीया' का कैसे ग्रहण हो जाता है ? (८) भ्यसोभ्यम् सूत्र के दो प्रकार के अर्थों का विवेचन करें ? (९) सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ (गीता १८.६६) यहां 'त्वाम्' को 'त्वा' हुआ है परन्तु 'माम्' को 'मा' नहीं, क्या कारण है ? (१०) युवावौ द्विवचने और त्वमावेकवचने में वचनग्रहण को स्पष्ट करें । (११) एषः, त्वम्, युष्माकम्, त्वयि, अस्मान्, आवाभ्याम्, सुपदः, त्वत्, मम, माम्, एनयोः, एतेषाम्, तस्मिन्, आवयोः— रूपों को सिद्ध करें । (१२) अधोलिखित सूत्र-वार्त्तिकों की व्याख्या करें— १ पादः पत् । २ योऽचि । ३ द्वितीयायाञ्च । ४ त्वाहौ सौ । ५ तदोः सः० । ६ समानवाक्ये युष्मदस्मदादेशाः० । ७ एते वांन्नावादयः० । (१३) ऐसा शब्द बताएं जिस के दोनों भ्यसों तथा दोनों 'औ' में रूप वा सिद्धि का भेद पड़ता हो । (यहां दकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।) —:०:— अब थकारान्त पुंल्लिङ्ग का वर्णन करते हैं— [लघु०] अग्निमत्, अग्निमद् । अग्निमथौ । अग्निमथः ॥ व्याख्या—अग्निं मथ्नातीति—अग्निमत् । अग्निकर्मोपपदाद् मन्थ् विलोडने