भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 476

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४६१ घृतस्पृश् (घी को छूने वाला) । घृतं स्पृशतीति घृतस्पृक् । यहां स्पृश् (तुदा० प०) धातु के उपपद में 'उदक' शब्द नहीं है किन्तु 'घृत' सुबन्त है, अतः स्पृशोऽनुदके क्विन् (३५०) से क्विन्प्रत्यय, उस का सर्वापहारलोप तथा उपपदसमास करने से 'घृतस्पृश्' शब्द निष्पन्न होता है । घृतस्पृश् + स् । सुँलोप, व्रश्चभ्रस्ज० (३०७) से शकार को षकार, झलां जशोऽन्ते (६७) से षकार को डकार, क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से डकार को गकार तथा वाऽवसाने (१४६) में वैकल्पिक चर्व-ककार करने पर—'घृतस्पृक्, घृतस्पृग्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं । समग्र रूपमाला यथा — प्र० घृतस्पृक्-ग् घृतस्पृशौ घृतस्पृशः | प० घृतस्पृशः घृतस्पृग्भ्याम् घृतस्पृग्भ्यः द्वि० घृतस्पृशम् ,, ,, | प० ,, घृतस्पृशोः घृतस्पृशाम् तृ० घृतस्पृशा घृतस्पृग्भ्याम् घृतस्पृग्भिः | स० घृतस्पृशि ,, घृतस्पृक्षु च० घृतस्पृशे ,, घृतस्पृग्भ्यः | सं० हे घृतस्पृक्-ग्! घृतस्पृशौ! घृतस्पृशः! भ्याम् आदियों में क्रमशः षत्व, डत्व और कुत्व हो जाता है । इसी प्रकार—मन्त्रस्पृश्, जलस्पृश्, तृणस्पृश्, वारिस्पृश्, स्पृश् (यह क्विबन्त है, यहां भी 'क्विन्प्रत्ययो यस्मात्' इस प्रकार बहुव्रीहि के आश्रयण से कुत्व हो जाता है) आदि शब्दों के रूप बनते हैं । (यहां शकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।) अब षकारान्त पुंल्लिङ्गों का वर्णन करते हैं— [लघु०] दधृक्, दधृग् । दधृषौ । दधृषः । दधृग्भ्याम् ॥ व्याख्या—'दधृष्' शब्द ऋत्विग्दधृक्० (३०१) सूत्र द्वारा धिष्णीं (ग्वा० प०) धातु से क्विबन्त निपातित होता है । दधृष् + स् । सुँ-लोप, जश्त्व से डकार, क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से गकार तथा वैकल्पिक चर्व से ककार होकर—'दधृक्, दधृग्' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं ।

  • दधृष् (तिरस्कार करने वाला) शब्द की रूपमाला यथा— प्र० दधृक्-ग् दधृषौ दधृषः | प० दधृषः दधृग्भ्याम् दधृग्भ्यः द्वि० दधृषम् ,, ,, | प० ,, दधृषोः दधृषाम् तृ० दधृषा दधृग्भ्याम्† दधृग्भिः | स० दधृषि ,, दधृक्षु च० दधृषे ,, दधृग्भ्यः | सं० हे दधृक्-ग्! हे दधृषौ! हे दधृषः! † क्रमशः जश्त्व से डकार और कुत्व से गकार हो जाता है । सकता है तथापि 'अनुदके' कथन के कारण क्विन् भी नहीं होता, ऐसा काशिका- कार आदि प्राचीन वैयाकरणों का मत है; परन्तु नव्य लोगों का कथन है कि क्विन् प्रत्यय तो हो जाता है परन्तु 'अनुदक' कथन के सामर्थ्य से कुत्व नहीं होना । अतः क्विबन्त के 'उदकस्पृट्' आदि रूप बनते हैं ।