भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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५१६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

भगवान् अन्दर अर्थात् अपने हृदय में खोजा जाता है। इन अर्थों में इस अव्यय के साथ प्रायः सप्तम्यन्त पद का प्रयोग होता है पर कहीं-कहीं षष्ठ्यन्त वा द्वितीयान्त का भी प्रयोग देखा जाता है। यथा—त्वमग्ने सर्वभूतानामन्तश्चरसि साक्षिवत् (याज्ञ० ७।१०४)। अन्तर्देवान् मर्त्यांश्च (ऋ० ८।२।४), देवों और मर्त्यो के बीच में। २ पकड़ना—अन्तर्हत्वा मूषिकां श्येनो गतः (काशिका १।४।६५), बाज चुहिया को मार कर पकड़ ले गया। [३] प्रातर्* ॥ १ प्रातःकाल, सुबह, सवेरे—प्रातर्द्यूतप्रसङ्गेन मध्याह्ने स्त्रीप्रसङ्गतः। रात्रौ चौरप्रसङ्गेन कालो गच्छति धीमताम् (सुभाषित)। द्यूतप्रसङ्ग =महाभारतम्, स्त्री- प्रसङ्ग =रामायणम्, चौरप्रसङ्ग =भागवतम्। [४] पुनर्* ॥ १ फिर, दोबारा—न पुनरेव प्रवर्त्तितव्यम् (शाकुन्तल० ६)। भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ?। गच्छतु भवान् पुनर्दर्शनाय (स्वप्न० १)। २ 'तु' के अर्थ में—पदं सहेत भ्रमरस्य पेलवं शिरीषपुष्पं न पुनः पतत्रिणः (कुमार० ५।४)। पुनः- पुनः—वार-वार—विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजना न परित्य- जन्ति (मुद्रा० २।१७)। किं पुनः = कहना ही क्या—मेघालोके भवति सुखिनोप्यन्य- थावृत्ति चेतः। कण्ठाश्लेषप्रणयिनि जने किं पुनर्दूरसंस्थे (मेघ० १।३)। पुनरपि = पुनः पुनः =वार-वार—पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम्। इह संसारे खलु दुस्तारे कृपया पारे पाहि मुरारे (चर्पट० ८)। [५] सनुतर् ॥ १ छिपना—सनुतश्चोरो गच्छति (गणरत्न०)। इस अव्यय का प्रयोग लोक में नहीं पाया जाता। अमरकोष आदि लौकिक कोषों में इस का कहीं उल्लेख नहीं। वेद में इस के प्रयोग मिलते हैं।१ नोट—उपर्युक्त पांचों अव्यय रेफान्त हैं अतः रुँ का रेफ़ न होने से हशि च (१०७) आदि द्वारा उत्व आदि कार्य नहीं होते। यथा—स्वर्गतः, प्रातर्गच्छ, पुनरथ, १ निघण्टु में यह 'निर्णीतान्तर्हित' अर्थ में पढ़ा गया है। निर्णीतं च तद् अन्तर्हितं चेति कर्मधारयः (स्कन्दमाहेश्वरकृत निरुक्तभाष्यटीका)। जो छिपा हुआ पर निर्णीत हो उसे 'सनुतर्' कहते हैं। श्रीसायण अपने वेदभाष्य में सर्वत्र इस का अर्थ 'छिपा हुआ' करते हैं—सनुतश्चरन्तम्—निगूढं चरन्तम् (ऋ० ५।२।४ सायणभाष्य)। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपने अष्टाध्यायीभाष्य तथा वेदा- ङ्गप्रकाश के 'अव्ययार्थ' में 'सनुत' का 'सदा' अर्थ लिखा है। सनुतः पुरुषार्थे प्रयतेरन्—यह उन्होंने उदाहरण भी दिया है। इस प्रकार आरे द्वेषांसि सनुतर्व्य- धाम (ऋ० ५।४५।५) इस ऋचा का अर्थ होगा—हम सदा शत्रुओं को दूर रखें। यह अर्थ भी सुसङ्गत प्रतीत होता है।