लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअव्यय-प्रकरणम् ५७६ क्त्वा (त्वा)—कृत्वा, पठित्वा, भूत्वा, गत्वा आदि। यहां समानकर्तृकयोः पूर्वकाले (८७६) सूत्र से क्त्वा प्रत्यय हो जाता है। अतः क्त्वाप्रत्ययान्त होने के कारण इन की प्रकृतसूत्र से अव्ययसंज्ञा हो जाती है। अव्ययसंज्ञा का प्रयोजन सुँब्लुक् (३७२) आदि होता है। तोसुँन् (तोस्)—उदेतोः (उदय होने तक), प्रवदितोः (बोलने तक), प्रच- रितोः (चलने तक) आदि। यहां भावलक्षणे स्थेण्वृञ्चदिचरिहृतमिजनिभ्यस्तोसुँन् (३.४.१६) सूत्र द्वारा तोसुँन् (तोस्) प्रत्यय हो जाता है। अतः इन की अव्ययसंज्ञा हो जाती है। कसुँन् (अस्)—विसृपः, आत्सृदः। यहां सृपिशृदोः कसुँन् (३.४.१७) सूत्र- द्वारा कसुँन् प्रत्यय हो जाता है। अतः प्रकृतसूत्र से तदन्तों की अव्ययसंज्ञा हो जाती है। क्त्वा, तोसुँन् और कसुँन् इन तीन प्रत्ययों में तोसुँन् और कसुँन् केवल वेद में तथा क्त्वा प्रत्यय लोक और वेद दोनों में समानरूप से प्रयुक्त होता है। ये तीनों प्रत्यय भी कृत्संज्ञक हैं। अब अव्ययीभावसमास की भी अव्ययसंज्ञा करते हैं— [लघु०] संज्ञा-सूत्रम्—(३७१) अव्ययीभावश्च ।१।१।४०॥ अधिहरि ॥ अर्थः—अव्ययीभावसमास भी अव्ययसंज्ञक होता है। व्याख्या—अव्ययीभावः १।१। च इत्यव्ययपदम्। अव्ययम् १।१। (स्वरादि- निपातमव्ययम् से)। अर्थः—(अव्ययीभावः) अव्ययीभावसमास (च) भी (अव्ययम्) अव्ययसंज्ञक होता है। अव्ययीभावसमास का विवेचन इस व्याख्या के समासप्रकरण में किया गया है वहीं देखें। उदाहरण यथा— अधिहरि [हरौ—इत्यधिहरि, हरि में]। यहां विभक्त्यर्थ में अव्ययं विभक्ति- समीप-समृद्धि० (६०८) सूत्र द्वारा अव्ययीभावसमास हो कर समासकार्य करने पर 'अधिहरि' शब्द निष्पन्न होता है¹। इस की प्रकृतसूत्र से अव्ययसंज्ञा हो जाती है अतः समासत्व के कारण प्रातिपदिक से उत्पन्न सुँ—सुँप् का अव्ययादाप्सुपः (३७२) से लुक् हो जाता है। इसी प्रकार—'यथाशक्ति' आदियों में समझ लेना चाहिये। अब अव्ययसंज्ञा करने के मुख्य प्रयोजन सुँब्लुक् का प्रतिपादन करते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३७२) अव्ययादाप्सुपः ।२।४।८२॥ अव्ययाद्विहितस्य आपः सुपश्च लुक्। तत्र शालायाम् ॥ १. इस की सम्पूर्ण सिद्धि अव्ययीभावसमास प्रकरण में देखें।