भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 596

अव्यय-प्रकरणम् ५८१

व्याख्या—भागुरि आचार्य सम्भवतः पाणिनि से पूर्ववर्त्ती वैयाकरण हो चुके हैं। जगदीश तर्कालङ्कार ने शब्दशक्तिप्रकाशिका में उन के अनेक मन्तव्यों का उल्लेख किया है। परन्तु अष्टाध्यायी में पाणिनि ने उन के मत का कहीं उल्लेख नहीं किया। भागुरि के मत में 'अव' और 'अपि' उपसर्गों के आदि अकार का लोप हो जाता है¹। अन्य आचार्यों के मत में न होने से विकल्प सिद्ध हो जाता है। उदाहरण यथा— (१) वगाहः, अवगाहः (स्नान आदि)। अवपूर्वक गाह् (गाहूँ विलोडने, भ्वा० आ०) धातु से भाव आदि में घञ् प्रत्यय हो कर अनुबन्धलोप करने से 'अव- गाहः' प्रयोग सिद्ध होता है। परन्तु भागुरि आचार्य के मत में 'अव' उपसर्ग के अकार का लोप हो कर—'वगाहः' प्रयोग बनता है। हमें सब आचार्य मान्य हैं अतः लोक में 'अवगाहः, वगाहः' दोनों प्रयोग मान्य हैं। इसी प्रकार शिष्टप्रयोगानुसार अन्य प्रत्ययों में भी समझ लेना चाहिये। साहित्यगत कुछ उदाहरण यथा—सुभगसलिलावगाहाः (शाकुन्तल० १.३)। जलावगाहक्षणमात्रशान्ता (रघु० ५.४७)। दग्धानामवगाहनाय विधिना रम्यं सरो निर्मितम् (शृङ्गारतिलक)। पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य (कुमार० १.१)। तमोऽपहन्त्री तमसां वगाह्य (रघु० १४.७६)। सुरभीकृतमपि नीर वगाह- मानमत्तमत्तङ्गजमदधाराभिः कटूकूर्वन् (शिवराज० २)। इसी प्रकार—अवतंसः—वतंसः (कर्णभूषण या शिरोभूषण, श्रेष्ठ)। यैर्वतंस- कुसुमैः प्रियमेताः(माघ० १०.६७)। पित्तेन दूने रसने सितापि तिक्तायते हंसकुलावतंस (नैषध० ३.६४)। अवस्था—वस्था (हालत, दशा)। कुम्भोऽप्येतां पितुरूपनतां वीक्ष्य वस्थां वपुष्मान् (महावीर० ६.४४)। अवस्था वस्तूनि प्रथयति च सङ्कोचयति च (नीति० ३६)। अवक्रयः - वक्रयः (मूल्य)। अवकीयतेऽनेनेति अवक्रयः, पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण (८७२) इति घः। मूल्यं वस्नोऽप्यवक्रय इत्यमरः। भागुरिमतेऽकारलोपे वक्रयः। मूल्ये वस्नाऽर्घ-वक्रया इति हेमचन्द्रः। अवक्रमः—वक्रमः (आप्टे०)। (२) पिधानम्, अपिधानम् (ढांपना या ढक्कन)। अपिपूर्वक धा (डुधाञ् धारण-पोषणयोः, जुहो० उ०) धातु से भाव या करण में ल्युट् प्रत्यय करने पर युवोर- नाकौ (७८५) सूत्र से युङ्को अन आदेश हो कर विभक्ति लाने से 'अपिधानम्' प्रयोग निष्पन्न होता है। भागुरि आचार्य के मत में 'अपि' के अकार का लोप हो कर— 'पिधानम्' बनेगा। हमें सब आचार्य मान्य हैं अतः लोक में 'अपिधानम्, पिधानम्' दोनों प्रयोग चलते हैं। इसी प्रकार अन्य प्रत्ययों में भी शिष्टप्रयोगानुसार जान लेना चाहिये। 'अपि' के अकारलोप के साहित्यगत कुछ उदाहरण यथा—गुरोर्यन्त्र परीवादो निन्दा वापि प्रवर्त्तते। कर्णौ तत्र पिधातव्यौ गन्तव्यं वा ततोऽन्यतः (मनु० २.२००)। भुजङ्गपिहितद्वारं पातालमधितिष्ठति (रघु० १.८०)। अधित काऽपि मुखे सलिलं सखी प्यधित कापि सरोजदलैः स्तनौ (नैषध० ४.१११)। लोपाभाव पक्ष में भी प्रयोग


१. यहां यह ध्यातव्य है कि 'अपि' के साहचर्य के कारण 'अव' के भी आद्य अकार का ही लोप होता है अन्त्य का नहीं।