भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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तथा विद्वत्ता स्थान-स्थान पर प्रकट होते ही हैं। छात्रोपयोगी किसी भी विषय का विवेचन छोड़ा नहीं गया। यह इस की बड़ी भारी विशेषता है। इस भाग मे तिङन्त- प्रकरण (दशगण तथा एकादश प्रक्रियाओं) का अत्यन्त विशद विवेचन प्रस्तुत किया गया है। यह प्रकरण धातुसम्बन्धी होने से व्याकरण का प्राण है। इस मे प्रत्येक धातु के दस लकारों की ससूत्र प्रक्रिया साध कर उनकी सारी रूपमाला भी दी गई है। इससे विद्यार्थियों को धातुरूपावलियो की आवश्यकता नहीं रहती। छ सौ के करीब टिप्पणियां तथा साढे चार सौ से अधिक उपसर्गयोग इस ग्रन्थ की अपनी अपूर्व विशेषता है। इन के लिए व्याख्याकार ने महान् श्रम कर विपुल संस्कृत-साहित्य से जो डेढ़ हजार के करीब अत्यन्त सुन्दर संस्कृत की सूक्तियों का चयन किया है। यह स्तुत्य है। सैकड़ों उपयोगी शङ्का समाधान तथा णिजन्त, सन्नन्त, यङन्त भावकर्म आदि अर्थ सहित कई शतर विद्यार्थियों के लिए निश्चय ही उपयोगी सिद्ध होंगे। इस ग्रन्थ की उत्कृष्टता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि अकेली भूधातु पर ही विद्वान् व्याख्याकार ने ६० पृष्ठों मे अपनी व्याख्या पूर्ण की है। सक्षेप मे इस व्याख्या को लघुकौमुदी का महाभाष्य कह सकते हैं। यह ग्रन्थ न केवल छात्रो, परीक्षार्थियो तथा उपाध्यायो, अध्यापकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा बल्कि अनुसंधान मे रुचि रखने वालों के लिए भी परमोपयोगी एव सहायक सिद्ध होगा। इसे पढ़ने से जहा व्याकरण जैसे शुष्क विषय मे सरसता पैदा होती है वहा अनुसंधान कार्य को भी बढ़ावा मिलता है। हिन्दी मे ऐसे ग्रन्थ स्वागत योग्य हैं।" (२६.८.७१) “लघु-सिद्धान्त-कौमुदी—भैमीव्याख्या” (तृतीय एव चतुर्थ भाग—प्रेस मे) भैमीव्याख्या के अन्तिम तृतीय तथा चतुर्थ भाग शीघ्र छपने जा रहे हैं। तृतीय भाग मे कृदन्त और कारक एव चतुर्थ भाग मे समास तद्धित और स्त्रीप्रत्यय का विस्तृत वैज्ञानिक तुलनात्मक विवेचन किया गया है। कृदन्तप्रकरण में तव्यत्-अनीयर् प्रत्ययान्तों, क्त्वाप्रत्ययान्तों, ल्यबन्तो और तुमुन्नन्ता की सार्थ विस्तृत तालिका देखते ही बनती है। क्त और क्तवतु प्रत्ययान्ता की तालिका भी बडे यत्न से संग्रहीत की गई है। यह भाग काव्यादि के सुन्दर उदाहरणा से यत्र तत्र ओत प्रोत है। स्थान- स्थान पर अनुसंधानापयोगी विशेष टिप्पण और शङ्का-समाधान दिये गय हैं। कारक- प्रकरण को पर्याप्त लम्बा और स्पष्ट किया गया है। इस के स्पष्टीकरणार्थ मूलाति- रिक्त अन्य अनेक सूत्र भी सार्थ सोदाहरण दिये गय हैं। इस प्रकरण का छात्रोपयोगी शुद्धाशुद्धविवेचन विशेष उपयोगी ह। समास और तद्धितप्रकरण का इतना विस्तृत व्याख्यान पहली बार इस व्याख्या मे उपलब्ध हुआ है। प्रत्येक प्रकरण के अन्त मे अभ्यास दिये गये हैं। स्त्रीप्रत्ययों पर छात्रोपयोगी विस्तृत तालिका इस व्याख्या की अपनी विशेषता ह। ग्रन्थ के अन्त मे अनुसंधानापयोगी नाना प्रकार के परिशिष्ट बड़े काम की वस्तु हैं।