लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २ ) भूमिका । की और ईश्वरकी कृपादृष्टिसे छपकर भी तयार होगयी । इस पुस्तकके पुनर्मुद्र- णादि सब अधिकार मैंने सेठ खेमराजजीको समर्पण करादिये हैं। अब आशा है कि गुणग्राहक सज्जन पुरुष इसको अवलोकन कर मेर परिश्रमको सफल करेंगे और वैदिक धर्मावलम्बियोंको तो इसको स्वाध्याय करना अत्यन्त ही आवश्यक है, क्योंकि ज्योतिषशास्त्र वेदका नेत्र है “ज्योतिषं नयनं स्मृतम्” ॥ आशा है कि, सज्जन पुरुष मत्सरताको छोडकर मुझसे मनुष्यधर्मानुसार जो भूल हुई हो उसको क्षमा करेंगे ॥ ग्रन्थकर्त्ताके समयादिका निर्णय. “लीलावती” के बनानेवाले श्रीभास्कराचार्य्य सह्यकुलपर्वतके समीप विज्जड़ विड (जो कि आजकल बीजापुर नामसे प्रसिद्ध है) नामक नगरमें वास करते थे इनका जन्म शाण्डिल्यगोत्र श्रीमद्महेश्वरोपाध्यायके यहां शाके १०३६ में हुआ था यह बात भास्कराचार्य्यने स्वयं गोलाध्यायके प्रश्नाध्यायमें लिखी है। यह कर्णा- टक ब्राह्मण और वैष्णवसम्प्रदायके थे। इनके रचना किये हुए लीलावती, बीजगणित, गोलाध्याय, गणिताध्याय, करणकुतूहल इत्यादि ग्रन्थ मिलते हैं। जिस प्रकार इस समय भास्कराचार्य्यके सिद्धान्तशिरोमणि ग्रन्थका अधिक प्रचार है इसी प्रकार भास्कराचार्य्यके समय लल्लसिद्धान्तका प्रचार था और भास्कराचार्य्य- ने भी लल्लसिद्धान्तको ही पढकर पाण्डित्यका लाभ कियाथा तदनन्तर ब्रह्मगुप्तके मतको स्वीकार करके लल्लमतके अनेक विषयोंका खण्डन किया था। इस लीलावती ग्रन्थ पर गंगाधर, गणेशदैवज्ञ, सूर्यदास, लक्ष्मीदास, मुनीश्वर, रामकृष्ण और कृपानाथादि महाशयोंकी टीकाएँ हैं और श्रीबापूदेव शास्त्रीकी टिप्पणी तथा श्रीयुत महामहो- पाध्याय काशिक प्रधान संस्कृतकालेजके गणितशास्त्राध्यापक श्रीसुधाकर द्विवेदी- जीकी बनाई हुई टिप्पणी भी छपी है और सन् १५८७ इस्वीमें अकबर बादशाहकी आज्ञानुसार इसी लीलावतीका अनुवाद फैजीने फारसीमें तथा सन् १८१६ इस्वीमें जे. टेलर ( J. Tayler ) साहबने और सन् १८१७ ई. में हेनरीटामस कोलब्रूक (Henry Thomas Colebrooke ) साहबने अंग्रेजीमें किया था। कोई २ ऐसा