लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअन्वयः-हे गणक ! येषाम् एकसहिता पञ्चाशत् १ । अष्टषाष्टः २ । पञ्चोनिता नवतिः ३ । आदिधनानि सन्ति । तैः त्रिभिः विमिश्रितधनैः वाणिज्यतः त्रिशती प्राप्ता तर्हि तेषां धनानि विभज्य वद ? ॥ १ ॥ अर्थः-हे गणितचातुरीधुरीण ! जिनके ५१ इक्यावन, ६८ अडसठ, ८५ पिच्यासी यह प्रक्षेपधन हैं, उन तीनोंने इकट्ठा धन करके व्यवहार किया तब सब धन उनको ३०० तीनसौ मिला ता उन तीनोंको क्या २ मिला यह अलग २ करके कहो? ॥ १ ॥ न्यासः-प्रक्षेपकाः ५१ । ६८ । ८५ मिश्रधनम् ३०० जातानि धनानि ७५ । १०० । १२५ एतान्यादिधनैरुनानि लाभाः २४ । ३२ । ४० अथवा-मिश्रधनम् ३०० आदिधनैक्येन २०४ ऊनं सर्वलाभयोगः ९६ अस्मिन्प्रक्षेपगुणिते प्रक्षेपयोग २०४ भक्ते लाभाः २४ । ३२ । ४० । फैलाव-यहां तीन वणिक् हैं उनका अलग २ धन ( प्रक्षेपधन ) ५१ । ६८ । ८५ इकावन, अडसठ, पिच्यासी है और मिश्रधन ३०० तीनसौ है इसी मिश्रधनसे प्रक्षेप- धनोंको अलग २ गुणा किया तब १५३०० । २०४०० । २५५०० ऐसा होनेपर प्रक्षेपधनोंके योग २०४ दोसौ चारसे तीनों जगह भाग दिया तब ७५ । १०० । १२५ पिछहत्तर, सौ, एकसौ पच्चीस यह क्रमसे तीनों जगह गुणनफल हुआ इनमें क्रमसे तीनोंको व्यवहार करके ७५ । १०० । १२५ । मिला. इन तीनों राशियोंमें क्रमसे प्रक्षेप धन ५१ । ६८ । ८५ को घटाया तब क्रमसे २४ । ३२ । ४० लाभ हुआ ॥ अथवा मिश्रधन ३०० में प्रक्षेप (आदि) धनोंके योगको घटाया तब सबको मिलकर ९६ छियानवे लाभ हुआ, इसको प्रक्षेपधनोंसे अलग २ गुणा किया तब क्रमसे ४८९६ । ६५२८ । ८१६० हुआ. यहां तीनों जगह प्रक्षेप योग २०४ का भाग लिया तब तीनोंको क्रमसे २४ । ३२ । ४० लाभ हुआ. इन तीनोंको जोडा तो वही मिलकर तीनों ९६ छियानवे लाभ हुआ. वाप्यादिपूरणे करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्- अब फुहारोंके द्वारा हौज, वापी पूरा होनेकी रीति आधे श्लोकमें लिखते हैं- भजेच्छिदोंशै रथ तैर्विमिश्रै रूपं भजेत्स्यात्परिपूतिकालः ॥ २३ ॥