लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ९० ) लीलावती । तब लब्धिका १२८/१ ६/१ ६/१ ऐसा रूप हुआ. इस प्रकार कर्पूर चन्दन, अगर इनका क्रमसे १४ ३/१ ६/१ ६/१ इतना द्रम्म मूल्य हुआ, फिर कर्पूर चन्दन, अगर इन तीनोंके भागों १/१ १६/१ ५/१ को मिश्रधन १६/१ से गुणा किया तब १६/१ २५६/१ १२८/१ ऐसा रूप हुआ. इनमें ऊपर जो योग किया था ३६/१ उसका भाग दिया तब लब्धिका ५/१ ६४/१ ९ ऐसा रूप हुआ इस प्रकार कर्पूर चन्दन अगर इनकी क्रमसे ५/१ ७ ३/१ ३ ५/१ इतना पल तोल हुआ यही मिलेगा. रत्नमिश्रीकरणसूत्रं वृत्तम्- रत्नोंके विषयकी मिश्र गणित करनेकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं- नरघ्नदानोनितरत्नशेषैरिष्टे हते स्युः खलु मूल्यसंख्याः ॥ शेषैर्हते शेषवधे पृथकस्थैरभिन्नमूल्यान्यथवा भवन्ति॥ २५॥ अन्वयः-खलु नरघ्नदानोनितरत्नशेषैः इष्टे हते मूल्यसंख्या स्युः । अथवा शेषवधे पृथक्स्थैः शेषैः हते अभिन्नमूल्यानि भवन्ति ॥ २५ ॥ अर्थः- (जहां मनुष्योंका अपने पदार्थोंके परस्पर अलटे पलटे समान धन कहा हो) तहां मनुष्योंकी संख्यासे गुणी हुई दानकी संख्याके घटानेसे जितने २ रत्न शेष रहें उनका अलग २ इष्ट अङ्कमें भाग ले तब जो जो लब्धि होगी वही निश्चय करके प्रति २ रत्नका मोल होगा. अथवा-सब जो शेष रहें उन सबको परस्पर गुणा करके जो राशि हो उसमें शेष अङ्कोंका अलग २ भाग दे तब प्रति २ रत्न का मोल लब्धि मिलेगा ॥ २५ ॥ अत्रोद्देशकः-इस विषयका उदाहरण- माणिक्याष्टकमिन्द्रनीलदशकं मुक्ताफलानां शतं सद्रत्नानि च पञ्च रत्नवणिजां येषां चतुर्णां धनम् ॥ संगस्नेहवशेन ते निजधनाद्दत्त्वैकमेकं मिथो जातास्तुल्यधनाः पृथग्वद सखे तद्रत्नमूल्यानि मे ॥१॥ अन्वयः- हे सखे ! येषां रत्नवणिजां माणिक्याष्टकम् इन्द्रनीलदशकम् मुक्ताफलानां शत सद्रत्नाणि च पञ्च चतुर्णां धनम् आसीत् ते सङ्गस्नेहवशेन निजधनात् एकम् एकम् मिथः दत्त्वा तुल्यधनाः जाताः तर्हि रत्नमूल्यानि मे पृथक् वद ॥ १ ॥