भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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रत्नमिश्रकव्यवहारः । (९१) अर्थः-हे मित्र ! जिन रत्नोंके व्यापार करनेवाले चार पुरुषोंका क्रमसे ८ आठ माणिक १० दश इन्द्रनीलमणि १०० सौ मोती ५ पांच सुन्दर हीरे यह धन था. उन्होंने मार्गमें स्नेह होनेसे अपने २ धनमेंसे आपसमें एक २ रत्न दिया तब उन सबके पास तुल्य मूल्यका धन हो गया तौ कहो माणिक आदि प्रति रत्नका क्या मोल होगा ? ॥ १ ॥ न्यासः--मा० ८ नी० १० मु० १०० व० ५ । दानम् १ नराः ४ । नरगुणितदानेन ४रत्नसंख्यासूनितासु शेषाणि मा० ४। नी० ६। मु० ९६ । व० १ एतैरिष्टराशौ भक्ते रत्नमूल्यानि स्यु रिति । तानि च यथाकथंचिदिष्टे कल्पिते भिन्नानि ॥ अत्रेष्टं स्वधिया कल्प्यते तथाऽत्रापीष्टं कल्पितम् ९६ ॥ अतो जातानि मूल्यानि २४ । १६ । १ । ९६ समधनम् २३३ । अथवा शेषाणां घाते २३०४ पृथक् शेषैर्भक्ते जातान्यभिन्नानि ५७६। ३८४ । २४ । २३०४ । जनानां चतुर्णां तुल्यधनम् ५५९२ तेषामैते द्रम्माः सम्भाव्यन्ते ॥ फैलाव-यहाँ व्यापारियोंने एक १ रत्न देकर पलटा किया वही एक रत्नदान है और मनुष्य चार ४ हैं, इस कारण मनुष्योंकी संख्या ४ से दानकी संख्या १ को गुणा किया तब ४ चार हुए. इनको सबके रत्नोंमेंसे घटाया तो बचे मा० नी० मु० $ \hspace{19em}४\hspace{1.5em}६\hspace{1.5em}९६$ हीरा इनका अलग २ इष्ट ९६ छियानवे मानकर उसमें भाग दिया तब क्रमसे एक $ \hspace{0.5em}१$ २ माणिक आदिका मोल हुआ. मा० नी० मु० ही० इस प्रकार आपसमें एक २ $ \hspace{11em}२४\hspace{1.5em}१६\hspace{1.5em}१\hspace{1.5em}९६$ रत्न पलट लेनेसे सबका धन बराबर हो जाता है, क्योंकि माणिकवालेके पास पाँच ५ माणिक एक १ नीलमणि, १ एक मुक्ता १ एक हीरा है. ऊपर १ माणिकआदि सबका मोल बता आये हैं, उसी हिसाबसे जोडा. अर्थात् ५ पाँच माणिकका मोल १२० एकसौ बीस द्रम्म हुए और एक नीलमणिका मोल १६ सोलह द्रम्म हुआ और एक १ मुक्ताका १ एक द्रम्म हुआ. १ एक हीरेके ९६ छियानवे द्रम्म हुए, सबको जोडा तब २३३ दोसौ तैंतीस द्रम्म हुये. इसी प्रकार दूसरेके पास एक १ माणिक सात ७ नीलमणि एक १ मुक्ता एक १ हीरा है, तीसरेके पास एक १