लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंफैलाव-यहां ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार सुवर्णकी तोलको अपने २ वर्ण (भाव) से गुणा किया तब क्रमसे गुणनफल १३०, ४८, २२, ४० यह हुआ, इनका योग (जोड) किया तब दोसौ चालीस २४० हुआ, इसमें सुवर्णके तोलका योग २० का भाग लिया तब १२ बारह लब्धि हुआ यही सब सुवर्णको गलाकर सबको एक भाव होगा. और जहाँ वही बीस २० मासे सुवर्ण गलानस १६ सोलह मासे रहा. वहाँ ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार उसी सुवर्णके तोल और वर्णके घात योग २४० में शोधनेसे जो सुवर्णके तोल १६ रही है उसका भाग दिया तब १५ लब्धि हुआ यही शुद्ध हुए सुवर्णका भाव होगा ॥ और जहाँ वही बीस २० मासे सुवर्ण गलानेस १६सोलहके भावका हो जाता है वहां ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार उसी सुवर्णके तोल और वर्णके घातयोग २४० म शुद्ध करनेपर जो वर्ण (भाव) हुआ. १६ उसका भाग लिया तब १५ पन्द्रह लब्धि हुआ. यही शुद्ध सुवर्णकी तोल रहेगी ॥ अथ वर्णज्ञानाय करणसूत्र वृत्तम्- जिन वर्णोंके मिलानेसे एक वर्ण हुआ है उनमेंसे जिस वर्णको नहीं जानते हैं उसके जाननेकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं- स्वर्णैक्यनिघ्नाद्युतिजातवर्णात्सुवर्णतद्वर्ण वधैक्यहीनात् ॥ अज्ञातवर्णाभ्रिजसंख्ययाप्तमज्ञातवर्णस्य भवेत्प्रमाणम् ॥२७॥ अन्वयः-द्युतिजातवर्णात् स्वर्णैक्यनिघ्नात् सुवर्णतद्वर्णवधैक्यहीनात् अज्ञातवर्णा- भिजसंख्यया यत् आप्तं तत् अज्ञातवर्णस्य प्रमाणं भवेत् ॥ २७ ॥ अथः-अनेक प्रकारके सुवर्ण मिलानेसे जो वर्ण (भाव) होता है वह युतिजात वर्ण कहा जाता है, उस युतिजात वर्णको सोनेकी तोलके योग (जोड) से गुणा करके उसमें सोनेकी तोल और वर्ग इनके घात योगको घटा दे जो शेष रहे उसमें उस सुवर्णकी तोलका भाग दे जिसका वर्ण नहीं जानते हैं उसका भाग देनेसे जो लब्धि हो वही उसी वर्णकी संख्या है. जिसकी संख्या नहीं जानते हैं ॥ २७ ॥ उदाहरणम्- दशेशवर्णा वसुनेत्रमाषा अज्ञातवर्णस्य षडेतदैक्ये ॥ जातं सखे द्वादशकं सुवर्णमज्ञातवर्णस्य वद प्रमाणम् ॥ १ ॥ अन्वयः-हे सखे ! वसुनेत्रमाषाः दशेशवर्णाः सन्ति । अज्ञातवर्णस्य षट् माषाः सन्ति । एतदैक्ये द्वादशकं सुवर्णं जातम् तर्हि अज्ञातवर्णस्य प्रमाणं वद ? ॥ १ ॥