लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ९६ ) लीलावती । अर्थः-हे मित्र ! आठ ८ और दो २ मासे सुवर्ण दश १० और ग्यारह ११ के वर्ण ( भाव ) का है और जिसका भाव नहीं जानते वह सुवर्ण ६ छ मासे है और सबको मिलाकर गलानेसे एक भाव १२ बारह होता है तो जिसका वर्ण ( भाव ) नहीं जानते हैं उसका क्या भाव होगा ? सो कहो ॥ १ ॥ न्यासः- $\begin{matrix} १० & ११ & ० ८ & २ & ६ \end{matrix}$ लब्धमज्ञातवर्णमानम् १५ ॥ फैलाव-यहां युतिजातवर्ण ( सब सुवर्णोंको मिलाकर गलानेसे जो भाव हुआ ) बारह १२ हैं, उसको सुवर्णकी तोलके योग ( जोड ) १६ सोलह १६ से गुणा किया तब १९२ एक सौ बानवे हुए. इसमें १९२ सुवर्णकी तोलको अपने २ वर्णसे गुणा करके ८० । २२ जो योग ( जोड ) १०२ हुआ उसको घटाया तब नव्वे ९० बचे इसमें अज्ञात वर्ण सुवर्णकी तोल ६ का भाग दिया तब १५ पन्द्रह लब्धि हुआ, यही उस सुवर्णका वर्ण ( भाव) है. जिसका वर्ण नहीं जानते थे. क्योंकि पहले कही हुई रीति के अनुसार अब सुवर्णकी तोलोंको अपने २ वर्णसे गुणा किया तब क्रमसे ८०, २२, ९० यह गुणनफल हुए. इनका योग किया तब १९२ एकसौ बानवे हुए, इसमें सुवर्णकी तोल ८, २, ६ के जोड. १६ का भाग देनेसे वही १२ बारह लब्धि युतिजातवर्ण मालूम हो जाता है ॥ सुवर्णज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तम्- जिन वर्णोंके मिलानेसे एक वर्ण हुआ है; उनमेंसे जिसकी तोल नहीं जानते हैं उसकी तोल जाननेकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं- स्वर्णैक्यनिघ्नो युतिजातवर्णः स्वर्णघ्नवर्णैक्यवियोजितं च ॥ अहेमवर्णाङ्घ्रिजयोगवर्णविश्लेषभक्तोऽविदिताङ्घ्रिजं स्यात्॥२८॥ अन्वयः-युतिजातवर्णः स्वर्णैक्यनिघ्नः स्वर्णघ्नवर्णैक्यवियोजितं च अहेमवर्णाङ्घ्रि जयोगवर्णविश्लेषभक्तः अविदिताङ्घ्रिजं स्यात् ॥ २८ ॥ अर्थः-युतिजातवर्ण ( सब सुवर्णोंको मिलाकर गलानेसे जो भाव हुआ है ) को सब सुवर्णकी योगसे गुणा करे. फिर जो गुणनफल हो उसमें जिन सुवर्णोंका वर्ण मालूम है उन सुवर्णोंकी तोलको अपने २ भावसे गुणा करके जो योग हो उसको घटा दे जो शेष रहे उसमें जिस सुवर्णका तोल नहीं मालूम है उसका वर्ण और युतिजातवर्ण इनका अन्तर करनेसे जो शेष रहे, उसका भाग देनेसे जो लब्धि हो वही उस तोलकी संख्या है, जिस तोलको नहीं जानते थे ॥ २८ ॥