भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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,सुवर्णगणितमिश्रप्रकारः। (९७) उदाहरणम्- उदाहरण कहते हैं.- दशेन्द्रवर्णा गुणचन्द्रमाषाः किंचित्तथा षोडशकस्य तेषाम्॥ जातं युतौ द्वादशकं सुवर्णं कतीह ते षोडशवर्णमाषाः ॥ १ ॥ अन्वयः-गुणचंद्रमाषाः दशेंद्रवर्णाः सन्ति । तथा षोडशकस्य किञ्चित् सन्ति । तेषां युतौ द्वादशकं सुवर्णं जातम् तर्हि इह ते षोडशवर्णमाषाः कति सन्ति? ॥ १॥ अर्थः-सुवर्ण ३ तीन और १ एक मासे क्रमसे दश १० और १४ चौदहके वर्णका है और जिसकी तोल नहीं जानते वह सोलह वर्णका है और सबको मिलाकर गलानेसे बारह १२ के भावका सुवर्ण होता है तो कहो वह सोलह १६ के भावका सुवर्ण कितना है ? ॥ १ ॥ न्यासः- १०/३ १४/१ १६/० लब्धं माषमानम् १ ॥ फैलाव-यहाँ युतिजातवर्ण १२ बारह है, उसको तोलके योग ४ चारसे गुणा किया तब ४८ अडतालीस हुआ. इसमें जिनकी तोल मालूम है उन सुवर्णोंको अपने २ वर्णसे गुणा करके ३०, १४, योग किया तब ४४ चौवालीस हुआ, इसको घटाया तब ४ चार शेष रहा. इसमें जिस सुवर्णकी तोल नहीं जानते हैं उसका १६ और युतिजातवर्ण १२ का अन्तर करनेसे जो शेष ४ रहा उसका भाग दिया तब १ एक लब्धि हुआ. यही उस सुवर्णकी तोल है. जिसका वर्ण जानकर भी तोल नहीं जानते थे. क्योंकि, ऐसा होनेपर सुवर्णकी तोलोंको अपने वर्णसे गुणा किया तब ३०, १४, १६ ऐसा हुआ. इसके योग ६० में तोलके योग | ३ | पांच ५ का भाग लिया तब लब्धि १२ बारह वही युति जात वर्ण होता है॥ | १ | | १ | | ५ | सुवर्णज्ञानायाऽन्यकरणसूत्रं वृत्तम्- जहाँ किसी भी वर्णकी तोल बिना जाने दोनोंकी तोल जाननेकी रीति और लिखते हैं एक श्लोकमें. साध्येनोनोऽनल्पवर्णो विधेयः साध्यो वर्णः स्वल्पवर्णोनितश्च॥ इष्टक्षुण्णे शेषके स्वर्णमाने स्यातां स्वल्पानल्पयोर्वर्णयोस्ते २९॥ अन्वयः-अनल्पवर्णः साध्येन ऊनः विधेयः । साध्यः वर्णः च स्वल्पवर्णोनितः विधेयः । ततः स्वल्पानल्पयोः वर्णयोः शेषके इष्टक्षुण्णे स्वर्णमाने स्याताम् ॥ २९ ॥ ७